DGFT का बड़ा कदम: अक्टूबर में शुरू होगा सेंट्रलाइज्ड ट्रेड हब, एक्सपोर्ट-इंपोर्ट होगा आसान

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AuthorNeha Patil|Published at:
DGFT का बड़ा कदम: अक्टूबर में शुरू होगा सेंट्रलाइज्ड ट्रेड हब, एक्सपोर्ट-इंपोर्ट होगा आसान

Directorate General of Foreign Trade (DGFT) दिल्ली में एक नया सेंट्रलाइज्ड हब शुरू करने जा रहा है। अक्टूबर 2026 के दूसरे हफ्ते से ट्रेड अप्रूवल की प्रक्रिया पेपरलेस और 'ज्युरिस्डिक्शन-फ्री' (jurisdiction-free) हो जाएगी, जिससे एक्सपोर्टर्स और इम्पोर्टर्स के लिए काम में आने वाली देरी खत्म होगी।

भारत के विदेश व्यापार को गति देने के लिए Directorate General of Foreign Trade (DGFT) एक बड़ा बदलाव करने जा रहा है। अक्टूबर 2026 के उत्तरार्ध में दिल्ली में एक 'सेंट्रल प्रोसेसिंग डिपार्टमेंट' (CPD) काम करना शुरू कर देगा, जो एक्सपोर्ट और इंपोर्ट से जुड़े आवेदनों के निपटारे का मुख्य केंद्र होगा।\n\n### फेसलेस सिस्टम की ओर कदम\n\nअब तक व्यापारियों को अपनी भौगोलिक स्थिति के आधार पर अलग-अलग रीजनल ऑफिसों पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे अप्रूवल में देरी और प्रक्रिया में असंगति बनी रहती थी। नए CPD मॉडल से इन रीजनल सीमाओं को खत्म किया जा रहा है। यह एक 'ज्युरिस्डिक्शन-फ्री' सिस्टम होगा, जहां अधिकांश रूटीन काम पूरी तरह से 'फेसलेस' होंगे। यानी व्यापारियों को अब सरकारी अधिकारियों से मिलने के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने होंगे। इस बदलाव के लिए 53 अधिकारियों की टीम तैनात की गई है, जिसमें जॉइंट, डिप्टी और असिस्टेंट डायरेक्टर्स शामिल हैं।\n\n### बिजनेस पर क्या होगा असर?\n\nफार्मास्युटिकल्स, टेक्सटाइल्स, इंजीनियरिंग और केमिकल्स जैसे सेक्टर्स की कंपनियों के लिए यह बड़ी राहत की खबर हो सकती है। इन क्षेत्रों में क्रॉस-बॉर्डर ट्रेड काफी ज्यादा होता है और सरकारी कागजी कार्रवाई में तेजी आने से वर्किंग कैपिटल मैनेजमेंट बेहतर होगा। इससे एक्सपोर्ट-इंपोर्ट के टाइमलाइन में निश्चितता आएगी।\n\n### रिस्क और चुनौतियां\n\nहालांकि, इस तरह के बड़े प्रशासनिक बदलाव के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। एक मैनुअल और रीजनल सिस्टम से पूरी तरह डिजिटल हब में शिफ्ट होने के दौरान शुरुआती दौर में तकनीकी तकनीकी दिक्कतें या ग्लिच (glitch) आ सकते हैं। इसके अलावा, 'फेसलेस' होने का मतलब यह नहीं है कि रेगुलेशन खत्म हो गया है। DGFT रिस्क-मैनेजमेंट फिल्टर्स का इस्तेमाल जारी रखेगा। जो आवेदन हाई-रिस्क कैटेगरी में आएंगे या जिनमें अनुपालन की कमी होगी, उनकी मैन्युअल जांच या रीजनल इंटरवेंशन की संभावना बनी रहेगी। निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर कितना स्मूथ काम करता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.