CII और IIM Ahmedabad की एक रिपोर्ट ने ग्रीन एनर्जी सेक्टर की मुश्किलों को सामने रखा है। करेंसी हेजिंग के बढ़ते खर्च की वजह से भारत में रिन्यूएबल एनर्जी लोन **8%** तक महंगे हो गए हैं, जो विदेशी निवेशकों को दूर कर रहे हैं।
करेंसी का गणित और ग्रीन एनर्जी
CII और IIM Ahmedabad की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, भारत का रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर एक बड़ी बाधा का सामना कर रहा है। असल में, ग्रीन प्रोजेक्ट डेवलपर्स विदेशी मुद्रा (जैसे US Dollar या Euro) में लोन लेते हैं क्योंकि वहां ब्याज दरें कम होती हैं, लेकिन कमाई भारतीय रुपये में होती है। डॉलर के मुकाबले रुपये में उतार-चढ़ाव होने पर कर्ज चुकाने की लागत अनिश्चित हो जाती है।
हेजिंग का भारी बोझ
इस रिस्क से बचने के लिए डेवलपर्स को 'करेंसी हेजिंग' (Currency Hedging) का सहारा लेना पड़ता है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रक्रिया में सालाना 6% से 8% का अतिरिक्त खर्च आता है। कॉम्पिटिटिव बिडिंग के कारण पहले से ही पतले मार्जिन पर काम कर रहे प्रोजेक्ट्स के लिए यह लागत उन्हें घाटे में धकेल सकती है। यह स्थिति विकसित देशों के मुकाबले भारतीय मार्केट में कैपिटल की कॉस्ट को लगभग दोगुना कर देती है।
बड़े निवेशकों की दूरी
इस करेंसी मिसमैच (Currency Mismatch) की वजह से उत्तर अमेरिका और यूरोप के पेंशन फंड्स जैसे बड़े इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स भारत में पैसा लगाने से हिचक रहे हैं। वे स्टेबल रिटर्न चाहते हैं, लेकिन करेंसी की अस्थिरता का रिस्क खुद नहीं उठाना चाहते।
समाधान: 'Green Finance Institution'
इस संकट से निपटने के लिए एक 'Green Finance Institution' बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। यह संस्थान 'ब्लेंडेड फाइनेंस' के जरिए काम करेगा, जहाँ सरकारी और मल्टीलेटरल फंड्स एक कुशन की तरह काम करेंगे और करेंसी रिस्क को कम करने या क्लाइमेट इंश्योरेंस मुहैया कराने में मदद करेंगे।
सेक्टर पर अन्य दबाव
रेटिंग एजेंसी ICRA ने भी आगाह किया है कि कमजोर रुपया और सोलर-बैटरी कंपोनेंट्स की बढ़ती कीमतें डेवलपर्स की फाइनेंशियल हेल्थ पर दबाव डाल रही हैं। हालांकि RBI ने जून 2026 में कुछ राहतकारी कदम उठाए थे, लेकिन बड़े स्ट्रक्चरल सुधार अभी भी बाकी हैं। अब बाजार की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस नए संस्थान के प्रस्ताव पर क्या फैसला लेती है।
