साल **2026** में भारतीय कंपनियों का औसत एट्रिशन रेट (Attrition Rate) बढ़कर **18%** पर पहुंच गया है, जो पिछले साल **16.2%** था। निश टैलेंट के लिए मची इस होड़ से कंपनियों का खर्च बढ़ना तय है, जो मुनाफे पर दबाव डाल सकता है।
कॉर्पोरेट इंडिया में कर्मचारियों के कंपनी छोड़ने का सिलसिला तेज होता दिख रहा है। हालांकि यह आंकड़ा कोविड के बाद के दौर की तुलना में कम है, लेकिन स्पेशलाइज्ड भूमिकाओं के लिए बाजार में मची खींचतान ने कंपनियों की टेंशन बढ़ा दी है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह चिंता की बात?
शेयरहोल्डर्स के लिए मुख्य समस्या सिर्फ कर्मचारियों का जाना नहीं, बल्कि उन्हें बदलने की भारी-भरकम लागत है। भर्ती (Recruiting) और ट्रेनिंग (Training) का चक्र कंपनी के ऑपरेटिंग खर्च को सीधे प्रभावित करता है। अगर यह खर्च रेवेन्यू ग्रोथ से मेल नहीं खाता, तो मार्जिन पर दबाव दिखना लाजिमी है।
सेक्टर का हाल: फाइनेंस और रियल एस्टेट पर ज्यादा दबाव
डेटा के मुताबिक, फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर में एट्रिशन दर 29.4% के ऊंचे स्तर पर है, वहीं रियल एस्टेट में यह 17.4% से उछलकर 21.7% पर पहुंच गई है। इन सेक्टरों में कुशल टैलेंट को रिटेन करने के लिए कंपनियां ऊंचे पैकेज ऑफर कर रही हैं, जिससे 'वेज इन्फ्लेशन' (Wage Inflation) बढ़ रहा है।
दूसरी तरफ, प्रोडक्ट आधारित टेक फर्मों में एट्रिशन रेट 13.8% है, जो दिखाता है कि बाजार में अभी भी चुनिंदा स्किल वाले लोगों की डिमांड ज्यादा है। सेमीकंडक्टर और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे सेक्टर में टैलेंट की कमी के कारण कर्मचारियों की बारगेनिंग पावर बढ़ गई है।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
अगली तिमाही नतीजों के दौरान कंपनियों की 'Employee Benefit Expenses' वाली लाइन पर खास नजर रखें। अगर यह खर्च रेवेन्यू से तेजी से बढ़ रहा है, तो समझ लीजिए कि प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव है। मैनेजमेंट की कमेंट्री में रिटेंशन स्ट्रैटेजी और सैलरी हाइक के बारे में दी गई जानकारी इस पर सबसे बड़ा संकेत होगी।
