PRICE और Tata Sons की एक नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि भारत का आर्थिक विकास अब दिल्ली-मुंबई जैसे 6 बड़े महानगरों से निकलकर छोटे शहरों तक फैल रहा है। उपभोक्ता खर्च के इस बदलाव से व्यापार के नए अवसर खुले हैं, लेकिन कुछ परिवारों के लिए वित्तीय जोखिम भी बढ़ रहे हैं।
PRICE और Tata Sons की हालिया स्टडी 'The Many Urban Indias' ने भारत के आर्थिक भूगोल में एक बड़े बदलाव की ओर इशारा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, विकास अब केवल पारंपरिक 'बिग सिक्स' (दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, कोलकाता और चेन्नई) तक सीमित नहीं रह गया है। हालांकि ये शहर अभी भी कुल खपत का 46% हिस्सा संभाले हुए हैं, लेकिन छोटे शहर अब घरेलू मांग के नए पावरहाउस बनकर उभरे हैं।
बड़े आंकड़े और बदलता रुझान
रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में देश के टॉप 100 शहरी केंद्र ₹74.5 लाख करोड़ की खपत पैदा करेंगे, जो कुल शहरी मांग का 61% होगा। सूरत, वडोदरा और तिरुपुर जैसे उभरते शहर प्रति परिवार खर्च के मामले में अब बड़े महानगरों को भी टक्कर दे रहे हैं।
शहरों का नया वर्गीकरण
स्टडी में 100 शहरों को चार श्रेणियों में बांटा गया है:
- बूमटाउन्स (Boomtowns): पुणे, अहमदाबाद और लखनऊ जैसे 19 शहर, जहां मिडिल-इनकम वर्ग तेजी से बढ़ रहा है।
- ब्रेकआउट (Breakout) शहर: 25 ऐसे शहर जो मैन्युफैक्चरिंग, टेक्सटाइल और ऑटो कंपोनेंट के जरिए आय बढ़ा रहे हैं।
- फ्रंटियर (Frontier) शहर: ये ग्रामीण और शहरी भारत के बीच एक पुल की तरह काम कर रहे हैं।
क्या हैं जोखिम?
विकास का यह विकेंद्रीकरण (Decentralization) जहां व्यापार के लिए बेहतरीन अवसर लाया है, वहीं कुछ चुनौतियां भी हैं। 'फ्रंटियर' शहरों में स्थिति थोड़ी चिंताजनक है, जहां हर 6 में से 1 परिवार अक्सर आर्थिक दबाव (Debt Pressure) झेल रहा है। छोटे शहरों के नए निवेशकों के लिए मार्केट की वोलाटिलिटी (Volatility) एक बड़ी चुनौती है, जिसके लिए बेहतर फाइनेंशियल लिटरेसी की जरूरत है।
निवेशकों और कंपनियों के लिए संदेश साफ है—अब केवल मेट्रो शहरों पर निर्भर रहने का वक्त नहीं है, बल्कि इन उभरते शहरी क्लस्टर्स की आर्थिक सेहत पर नजर रखना जरूरी हो गया है।
