कांग्रेस पार्टी ने सरकार से E20 फ्यूल मिक्सिंग पॉलिसी की समीक्षा (Review) की मांग की है। पार्टी का कहना है कि चीनी और मक्के जैसी ज़रूरी चीज़ों के दाम बेतहाशा बढ़े हैं और एथेनॉल के लिए फसलों के इस्तेमाल से खाने-पीने की चीज़ों में महंगाई बढ़ रही है। निवेशकों के लिए, यह डेवलपमेंट चीनी और डिस्टिलरी सेक्टर में रेगुलेटरी अनिश्चितता (Regulatory Uncertainty) पैदा कर सकता है।
E20 फ्यूल पॉलिसी पर कांग्रेस का बड़ा वार
कांग्रेस पार्टी ने सरकार की E20 फ्यूल पॉलिसी, जिसके तहत पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाना अनिवार्य है, की तत्काल समीक्षा (Review) की मांग की है। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा है कि इस पॉलिसी के कारण आम जनता को ईंधन और ज़रूरी खाने-पीने की चीज़ों, दोनों की बढ़ती कीमतों से भारी आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ रही है। विपक्ष ने इस पॉलिसी को आम जनता के लिए हानिकारक बताया है और सरकार से गैर-एथेनॉल फ्यूल (Non-ethanol fuel) के विकल्प उपलब्ध कराने की अपील की है।
खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों पर असर
कांग्रेस का मुख्य तर्क यह है कि एथेनॉल प्रोडक्शन के लिए कृषि उपज (Agricultural produce) के डायवर्जन से खाद्य बाज़ार में सप्लाई की कमी हो रही है और कीमतें बेतहाशा बढ़ रही हैं। पार्टी द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन महीनों में चीनी की कीमतों में 40% की बढ़ोतरी हुई है, जो ₹48 प्रति किलो से बढ़कर ₹67 प्रति किलो हो गई हैं। अन्य ज़रूरी चीज़ों में भी ऐसे ही रुझान देखे गए हैं, जैसे गुड़ की कीमतों में 24%, चावल में 16% और मक्के के आटे में 11% की वृद्धि हुई है। पार्टी का अनुमान है कि लगभग 25 लाख टन चीनी-ग्रेड गन्ने को एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए डायवर्ट किया गया है, जिसे वे इस महंगाई का मुख्य कारण बता रहे हैं।
ऑटोमोबाइल और आम उपभोक्ता की चिंताएं
खाने-पीने की महंगाई के अलावा, आलोचना वाहनों के मालिकों पर पड़ने वाले असर को लेकर भी है। कांग्रेस ने E20 फ्यूल के कारण गाड़ी के माइलेज में कमी और इंजन में संभावित समस्याओं को लेकर शिकायतें उजागर की हैं। पार्टी ने यह सवाल भी उठाया है कि जब इंटरनेशनल क्रूड ऑयल की कीमतें गिरी हैं, तब भी आम जनता के लिए रिटेल पेट्रोल की कीमतें ऊंची क्यों बनी हुई हैं? उनका कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग से होने वाली बचत का फायदा ग्राहकों तक नहीं पहुंचाया जा रहा है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी (Congress Working Committee) ने पहले भी फ्यूल कंटैमिनेशन (Fuel contamination) और खाद्य उत्पादन से कृषि संसाधनों को हटाने के पर्यावरणीय खतरों को लेकर चिंता जताई है।
निवेशकों का नजरिया और बिजनेस का संदर्भ
E20 पॉलिसी भारत में शुगर और डिस्टिलरी इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा बूस्ट साबित हुई है, क्योंकि सरकारी अनिवार्यताओं ने एथेनॉल के लिए एक स्थिर और गारंटीकृत बाज़ार प्रदान किया है। कई शुगर कंपनियों ने इस मांग का फायदा उठाने के लिए अपनी डिस्टिलरी क्षमता (Distillery capacities) का विस्तार किया है, जिससे उन्हें चीनी उत्पादन से परे अपने रेवेन्यू स्ट्रीम को डायवर्सिफाई करने में मदद मिली है।
हालांकि, राजनीतिक दबाव और पॉलिसी समीक्षा की मांगें अचानक रेगुलेटरी अनिश्चितता (Regulatory uncertainty) पैदा करती हैं। अगर सरकार खाद्य महंगाई की चिंताओं के जवाब में एथेनॉल ब्लेंडिंग रोडमैप को रोकती है या महत्वपूर्ण रूप से संशोधित करती है, तो एथेनॉल उत्पादन में भारी निवेश करने वाली कंपनियों को बिज़नेस रिस्क या संभावित रेवेन्यू अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है। इस सेक्टर में निवेशकों को सरकारी प्रतिक्रियाओं, ब्लेंडिंग मैंडेट में किसी भी संभावित बदलाव और चीनी व मक्के की कमोडिटी कीमतों पर अपडेट पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि ये कारक एथेनॉल-केंद्रित बिज़नेस मॉडल की भविष्य की व्यवहार्यता और लाभप्रदता को प्रभावित करेंगे।
