वाणिज्य मंत्रालय (Commerce Ministry) अब जिला स्तर पर निर्यातकों की मदद के लिए **1,000** ट्रेड एक्सपर्ट्स तैयार करेगा। स्थानीय भाषाओं में मिलने वाली इस मदद से Free Trade Agreements का लाभ उठाना आसान होगा और कागजी कार्रवाई की जटिलता कम होगी।
भारत के एक्सपोर्ट सेक्टर को नई रफ्तार देने के लिए वाणिज्य मंत्रालय ने एक मास्टर प्लान तैयार किया है। सरकार का फोकस उन लघु और मध्यम उद्योगों (SMEs) पर है जो अंतरराष्ट्रीय ट्रेड डॉक्यूमेंटेशन और नियमों की उलझन के कारण पीछे रह जाते हैं। इन एक्सपर्ट्स की तैनाती से छोटे निर्यातकों को अपनी स्थानीय भाषा में सलाह मिल सकेगी, जिससे वे वैश्विक बाजारों में अधिक आक्रामक तरीके से कदम रख पाएंगे।
हब कल्चर और कम होती चुनौतियां
वर्तमान में, निर्यातकों को क्लीयरेंस के लिए Directorate General of Foreign Trade (DGFT) से लेकर कस्टम विभाग तक कई अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। अब मंत्रालय इन्हें बड़े शहरों में 'इंटीग्रेटेड कॉमर्स एंड इंडस्ट्री हब्स' में बदलने जा रहा है। इस 'वन-स्टॉप-शॉप' मॉडल से न केवल समय की बचत होगी, बल्कि एडमिनिस्ट्रेटिव बोझ भी कम होगा।
निवेशकों के लिए क्यों है यह जरूरी?
भारत में लॉजिस्टिक्स लागत अभी भी GDP का 8% से 14% के बीच बनी हुई है, जो ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के मुकाबले काफी ज्यादा है। इसे कम करने के लिए सरकार National Logistics Policy और PM GatiShakti जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है।
टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और फार्मास्यूटिकल्स जैसे सेक्टर, जो बड़ी मात्रा में एक्सपोर्ट पर निर्भर हैं, उन्हें इन बदलावों से सीधा फायदा होगा। अगर एक्सपोर्ट हब्स का क्रियान्वयन सफल रहता है, तो कंपनियों की ऑपरेटिंग लागत में गिरावट आएगी और उनका प्रॉफिट मार्जिन बेहतर हो सकता है। बाजार की नजर अब इस बात पर है कि ये हब्स कितनी तेजी से धरातल पर उतरते हैं और FTA के उपयोग में कितनी बढ़ोत्तरी होती है।
