भारत में बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कोल पावर पर निर्भरता बढ़ी है। हालांकि, अब नए कड़े उत्सर्जन नियमों (Emission Norms) और रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ते कदमों के बीच पावर कंपनियों के मुनाफे और खर्चों पर असर पड़ सकता है।
ऊर्जा बनाम पर्यावरण का संतुलन\n\nसाल 2000 से 2020 के बीच भारत में बिजली की डिमांड 4 गुना बढ़ गई। इस जरूरत को पूरा करने के लिए देश में कोयला आधारित पावर प्लांट की संख्या 71 से बढ़कर 253 पहुंच गई। इस विस्तार ने औद्योगिक विकास को तो गति दी, लेकिन इसका स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ा है। आंकड़ों के अनुसार, शहरी प्रदूषण के कारण होने वाली सालाना मौतों का आंकड़ा 0.87 मिलियन तक पहुंच गया है।\n\n### रेगुलेटरी दबाव और वित्तीय असर\n\nनिवेशकों के लिए अब यह केवल ESG का मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे तौर पर बैलेंस शीट का हिस्सा बन गया है। सरकार ने थर्मल पावर प्लांट्स के लिए Flue Gas Desulphurisation (FGD) यूनिट्स लगाना अनिवार्य कर दिया है। इन यूनिट्स को लगाने में काफी ज्यादा कैपिटल खर्च (Capex) होता है, जो पावर कंपनियों के मुनाफे और प्रोजेक्ट के इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न (IRR) को प्रभावित करता है।\n\n### कोल की अहमियत और रिन्यूएबल की चुनौती\n\nइंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार, साल 2030 तक भारत में बिजली की मांग में सालाना 6.4% की बढ़ोतरी की उम्मीद है। भले ही सोलर और विंड एनर्जी पर जोर है, लेकिन बेसलोड पावर के लिए कोयला अभी भी रीढ़ बना रहेगा। नई कैपेसिटी का लगभग 25% हिस्सा अभी भी कोयले के जरिए ही आएगा।\n\n### निवेशकों के लिए जरूरी संकेत\n\nआने वाले समय में पावर सेक्टर का प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां इन उत्सर्जन नियमों (Emission Compliance) को कितनी कुशलता से लागू करती हैं और क्या वे इस अतिरिक्त लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल पाती हैं। इसके अलावा, जो कंपनियां अपने पोर्टफोलियो को थर्मल से रिन्यूएबल एनर्जी की ओर तेजी से शिफ्ट करेंगी, लंबे समय में उनकी वैल्यूएशन बेहतर रहने की उम्मीद है।