पूर्व वित्त मंत्री P. Chidambaram ने भारत की मौजूदा आर्थिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बिजनेस टुडे इंडिया@100 इवेंट में कहा कि आज के नियम-कानून 1991 के 'लाइसेंस राज' से भी ज्यादाThe restrictive हैं। उन्होंने सरकार की मैन्युफैक्चरिंग के लिए भारी सब्सिडी देने की नीति पर भी चिंता जताई और कहा कि कुछ चुनिंदा कंपनियों का मार्केट पर कब्जा बढ़ता जा रहा है।
1991 से भी 'खराब' रेगुलेटरी माहौल?
पूर्व वित्त मंत्री P. Chidambaram ने हाल ही में बिजनेस टुडे इंडिया@100 इवेंट में भारत की अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत पर तीखी टिप्पणी की। उनका मानना है कि आज का रेगुलेटरी माहौल 1991 के उदारीकरण से पहले के 'लाइसेंस राज' से भी ज्यादाThe restrictive है। चिदंबरम ने इसे 'रूल्स-एंड-रेगुलेशंस राज' करार दिया। उनके मुताबिक, अर्थव्यवस्था इस वक्त भारी रेगुलेशन, सरकारी जांच और नौकरशाही की जकड़न में फंसी हुई है, जो प्राइवेट बिजनेस की ग्रोथ में बाधा डाल रही है।
मैन्युफैक्चरिंग सब्सिडी और GDP में योगदान
चिदंबरम ने सरकार की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की नीति, खासकर सेमीकंडक्टर जैसे हाई-टेक सेक्टरों में, पर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि इन पहलों के लिए जरूरी कैपिटल का एक बड़ा हिस्सा, करीब 80-85%, सरकारी खजाने से आ रहा है। उन्होंने इस मॉडल की लॉन्ग-टर्म स्थिरता पर भी शंका जताई और कहा कि ऐसी सरकारी निर्भरता कॉम्पिटिटिव इंडस्ट्री को जन्म नहीं दे सकती।
उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय GDP में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का योगदान लंबे समय से करीब 14% पर ही टिका हुआ है। यह निवेशकों के लिए एक अहम पॉइंट है, क्योंकि माना जाता है कि मैन्युफैक्चरिंग में ग्रोथ से ही बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा होती हैं और अर्थव्यवस्था का विस्तार होता है।
मार्केट में एकाग्रता पर चिंता
मैन्युफैक्चरिंग के अलावा, चिदंबरम ने टेलीकॉम, पेट्रोलियम, सीमेंट और स्टील जैसे बड़े सेक्टर्स में कुछ चुनिंदा बड़ी कंपनियों का दबदबा बढ़ने पर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना है कि इस कंसॉलिडेशन (एकाग्रता) से मार्केट में कॉम्पिटिशन कम हो रहा है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि फेयर कॉम्पिटिशन सुनिश्चित करने वाली संस्थाओं, जैसे कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commission of India), को बड़े मर्जर और एक्विजिशन से मार्केट पर पड़ने वाले असर से निपटने के लिए और मजबूत बनाने की जरूरत है।
विदेशी व्यापार और कूटनीति
पूर्व मंत्री ने भारत की फॉरेन ट्रेड स्ट्रैटेजी की भी आलोचना की। उन्होंने निराशा व्यक्त की कि अमेरिका, चीन और जर्मनी जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ महत्वपूर्ण ट्रेड एग्रीमेंट अभी तक फाइनल नहीं हुए हैं। चिदंबरम ने कहा कि भारत ने छोटे देशों के साथ कई ट्रेड डील की हैं, लेकिन वे भारत की बड़ी ट्रेड जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
जो निवेशक इन मुद्दों पर नजर रख रहे हैं, उन्हें मैन्युफैक्चरिंग सब्सिडी पर सरकार के रुख, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ ट्रेड नेगोशिएशन की गति और सेक्टर कंसॉलिडेशन व कॉम्पिटिशन पर रेगुलेटरी अप्रोच में किसी भी बदलाव पर ध्यान देना चाहिए। ये फैक्टर्स प्राइवेट सेक्टर इन्वेस्टमेंट और कॉर्पोरेट ग्रोथ के भविष्य के माहौल को समझने में महत्वपूर्ण बने रहेंगे।
