केंद्र सरकार ने राज्यों से ₹2 लाख करोड़ की कैपिटल इन्वेस्टमेंट लोन स्कीम के तहत खर्च बढ़ाने को कहा है। 1 अक्टूबर तक सिर्फ **26%** फंड ही रिलीज हो पाया है, जिससे इंफ्रा सेक्टर की कंपनियों के लिए ऑर्डर फ्लो पर दबाव बढ़ सकता है।
केंद्र सरकार ने 'Scheme for Special Assistance to States for Capital Investment' के तहत राज्यों को फंड का तुरंत इस्तेमाल करने का निर्देश दिया है। यह प्रोग्राम देश में रोड, ब्रिज और अन्य अहम इंफ्रा प्रोजेक्ट्स के लिए 50 साल तक के ब्याज मुक्त लोन (Interest-free loan) मुहैया कराता है। हालांकि, ताजा आंकड़ों के मुताबिक 1 अक्टूबर तक कुल ₹2 लाख करोड़ के सालाना बजट में से केवल ₹51,000 करोड़ यानी 26% ही रिलीज हुए हैं।
निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
बाजार के जानकारों के लिए केंद्र और राज्यों के इंफ्रा खर्च के बीच का यह अंतर एक चिंता का विषय है। केंद्र सरकार ने अगस्त 2026 तक अपने ₹12.22 लाख करोड़ के कैपिटल स्पेंडिंग टारगेट का 42% इस्तेमाल कर लिया है, जबकि राज्य इस मामले में पीछे चल रहे हैं। सरकार अब राज्य के अधिकारियों के साथ सीधे तालमेल बिठा रही है ताकि फाइनेंशियल ईयर के बाकी बचे महीनों में शेष 74% बजट का सही तरीके से इस्तेमाल हो सके।
किन सेक्टरों पर पड़ेगा असर?
शेयर बाजार में कंस्ट्रक्शन, सीमेंट, स्टील और कैपिटल गुड्स कंपनियां सरकारी प्रोजेक्ट्स पर काफी हद तक निर्भर हैं। जब राज्यों की ओर से खर्च में देरी होती है, तो इन कंपनियों के पास आने वाले ऑर्डर (Order inflow) और प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन की गति धीमी हो जाती है।
सुस्ती की मुख्य वजहें
इस धीमी रफ्तार के पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला, राज्यों की तरफ से 'यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट' जमा न करना और दूसरा, राज्यों का बिगड़ा हुआ फिस्कल बैलेंस। कई राज्यों पर रेवेन्यू खर्च का भारी दबाव है, जिससे वे नए कैपिटल प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता नहीं दे पा रहे हैं। आने वाले कुछ महीने इंफ्रा सेक्टर के लिए बेहद अहम होंगे, क्योंकि इन प्रोजेक्ट्स की गति ही कंपनियों के ग्रोथ आउटलुक को तय करेगी।
