केंद्र सरकार ने Census Rules 1990 में बदलाव करते हुए प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों, बैंक कर्मचारियों और पब्लिक सेक्टर के स्टाफ को जनगणना में शामिल करने की मंजूरी दी है। **₹11,718 करोड़** के बजट वाली इस कवायद में मैनपावर की कमी को दूर किया जाएगा, हालांकि पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में कानूनी पेच अभी भी बरकरार है।
भारत सरकार ने आगामी 2027 की जनगणना के लिए एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया द्वारा जारी गजट नोटिफिकेशन के मुताबिक, अब राज्य और केंद्र शासित प्रदेश जनगणना का डेटा जुटाने के लिए प्राइवेट (aided और unaided) स्कूलों के टीचरों के साथ-साथ बैंकों और पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSU) के कर्मचारियों की सेवाएं ले सकेंगे। यह कदम ₹11,718 करोड़ के विशाल बजट वाली इस जनगणना प्रक्रिया को रफ्तार देने के लिए उठाया गया है।
क्यों पड़ी ये जरूरत?
साल 2021 में प्रस्तावित जनगणना महामारी के कारण टल गई थी। अब 2027 में होने वाली हाउस-लिस्टिंग और जनसंख्या गणना को सुव्यवस्थित करने के लिए भारी मैनपावर की जरूरत है। सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया है कि जनगणना का शेड्यूल उत्तर प्रदेश, गोवा और पंजाब जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ न टकराए, ताकि प्रक्रिया निर्बाध रूप से पूरी हो सके।
कानूनी पचड़ा और अनिश्चितता
हालांकि सरकार ने दायरा बढ़ा दिया है, लेकिन 'हरियाणा प्रोग्रेसिव स्कूल कॉन्फ्रेंस' ने इस फैसले को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि जनगणना एक्ट 1948 के तहत प्राइवेट संस्थाओं को 'लोकल अथॉरिटी' नहीं माना जा सकता। फिलहाल पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के उस निर्देश पर रोक लगा दी है, जिसमें प्राइवेट शिक्षकों की ड्यूटी जनगणना में लगाने की बात कही गई थी। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल 2027 में होनी है, जिस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि क्या भविष्य में प्राइवेट सेक्टर के स्टाफ को इस तरह की सरकारी जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है या नहीं।
