अंताल्या में शुरू हुए COP31 शिखर सम्मेलन में दुनिया भर के नेता **$1.3 ट्रिलियन** के क्लाइमेट फाइनेंस गैप को भरने पर चर्चा कर रहे हैं। भारत के लिए यह समिट बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ फंडिंग के साथ-साथ यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन बॉर्डर टैक्स जैसे व्यापारिक बाधाओं पर भी मंथन होगा, जो घरेलू इंडस्ट्रीज को प्रभावित कर सकते हैं।
तुर्की के अंताल्या में 9 नवंबर से 20 नवंबर, 2026 तक चलने वाले इस 31वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन का मुख्य एजेंडा $1.3 ट्रिलियन सालाना का क्लाइमेट फाइनेंस लक्ष्य है। विकासशील देशों के लिए अपनी अर्थव्यवस्था को क्लीन एनर्जी की ओर ले जाने के लिए यह फंड अनिवार्य है, लेकिन ग्लोबल डेट और घटते इंटरनेशनल एड बजट के चलते इसे जुटाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
भारत का रुख और ट्रेड पर असर
भारत के लिए यह समिट सिर्फ ग्लोबल पॉलिसी नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा का मुद्दा है। नई दिल्ली, यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन बॉर्डर टैक्स जैसे संरक्षणवादी कदमों का कड़ा विरोध कर रही है। यह टैक्स एक्सपोर्टर्स पर कार्बन उत्सर्जन के लिए शुल्क लगाता है। स्टील और अन्य हाई-एमिशन वाले सेक्टर पर इसकी सीधी मार पड़ सकती है। यदि इन नियमों को सख्ती से लागू किया गया, तो भारतीय सामान ग्लोबल मार्केट में महंगे हो सकते हैं, जिससे कंपनियों को भारी लागत या डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonization) में बड़े निवेश के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
भारत की उपलब्धि और निवेश पर प्रभाव
भारत पहले ही अपना 50% नॉन-फॉसिल पावर क्षमता का लक्ष्य समय से पहले हासिल कर चुका है। भारत का स्पष्ट मानना है कि विकसित देशों को ट्रांजिशन फंडिंग में बड़ी जिम्मेदारी उठानी चाहिए। निवेशकों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण है कि यह समिट क्या कोई ठोस फाइनेंस मैकेनिज्म तैयार कर पाती है या नहीं। यदि समिट में फंडिंग का स्पष्ट रोडमैप नहीं मिलता है, तो आने वाले दशक में एनर्जी-इंटेंसिव कंपनियों के लिए कैपिटल की लागत और रेगुलेटरी दबाव बढ़ सकता है।
ग्लोबल वार्मिंग के 1.7-1.8°C तक पहुंचने के अनुमानों ने इस समिट पर दबाव बढ़ा दिया है। अब दुनिया केवल एमिशन घटाने पर ही नहीं, बल्कि 'अडैप्टेशन' पर भी फोकस कर रही है, जिसके लिए बड़े पैमाने पर पूंजी की जरूरत है। बाजार की नजर इस बात पर होगी कि विकासशील देशों की परियोजनाओं में पूंजी प्रवाह को आसान बनाने के लिए क्या डी-रिस्किंग मैकेनिज्म अपनाए जाते हैं।
