मॉनसून में **12.6%** की कमी और पांच राज्यों में सूखे के बीच COP31 में भारत की चुनौतियां बढ़ गई हैं। क्लाइमेट अडैप्टेशन का लगभग पूरा खर्च देश खुद उठा रहा है, जिससे निवेशकों की नजर अब फूड इन्फ्लेशन और ग्रामीण मांग पर टिकी है।
COP31 जलवायु शिखर सम्मेलन में भारत की भागीदारी ऐसे समय में हो रही है जब देश 1950 के बाद से सबसे गंभीर 'एल नीनो' (El Niño) के प्रभाव से जूझ रहा है। पिछले एक दशक में सबसे कम, यानी 12.6% की मॉनसून कमी ने महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और राजस्थान में सूखे जैसे हालात पैदा कर दिए हैं। इसका सीधा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ रहा है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था और ग्रामीण खपत (Rural Consumption) का मुख्य आधार है।
ग्रामीण मांग पर आर्थिक दबाव
जलवायु के कारण पैदा हुआ यह संकट अर्थव्यवस्था के लिए दोहरी चुनौती है। कृषि उत्पादन घटने से फूड इन्फ्लेशन बढ़ने का खतरा बढ़ गया है, जिससे ग्रामीण आबादी की क्रय शक्ति (Purchasing Power) प्रभावित हो रही है। निवेशकों के लिए, यह FMCG और एग्री-इनपुट सेक्टर की कंपनियों के लिए एक रिस्क फैक्टर है। हालांकि सरकार खाद्य आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन ये मौसमी बदलाव RBI की मॉनेटरी पॉलिसी को भी प्रभावित कर सकते हैं।
क्लाइमेट ट्रांजिशन का वित्तीय बोझ
भारत के लिए क्लाइमेट अडैप्टेशन की अनुमानित लागत ₹56.7 लाख करोड़ है। ध्यान देने वाली बात यह है कि देश अपने मिटिगेशन प्रयासों का 83% और अडैप्टेशन का 98% खर्च घरेलू स्तर पर उठा रहा है। आंतरिक पूंजी पर यह निर्भरता सीधे तौर पर सरकार के फिजिकल मैनेजमेंट को प्रभावित करती है। निवेशकों को यह देखना होगा कि सरकार इन बड़े खर्चों और अपने फिजिकल कंसोलिडेशन के लक्ष्यों के बीच संतुलन कैसे बनाती है।
एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश
आर्थिक बोझ के बावजूद, भारत एनर्जी ट्रांजिशन में भारी पूंजी लगा रहा है। देश ने एनर्जी स्टोरेज और ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर में $19.3 बिलियन का निवेश किया है। यह खर्च पावर सेक्टर की बड़ी कंपनियों के लिए एक सपोर्ट बेस का काम कर रहा है। हालांकि, इन निवेशों का लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कितना सस्ता और लंबे समय के लिए फाइनेंस मिलता है।
ग्लोबल फंडिंग की सीमित भूमिका
'लॉस एंड डैमेज फंड' (Loss and Damage Fund) की सीमित राशि अभी भी एक बड़ा सवाल बनी हुई है। फंड में केवल $350 मिलियन की राशि है, जबकि मांग $2.8 बिलियन की है। भारत के लिए ग्लोबल फंड का सहारा फिलहाल नाकाफी है, इसलिए सरकार की आत्मनिर्भरता वाली रणनीति जारी रहने की उम्मीद है। निवेशकों को अब सरकारी कैपिटल स्पेंडिंग और क्लाइमेट से संबंधित सेक्टर-स्पेसिफिक पॉलिसी पर कड़ी नजर रखनी चाहिए।
