उलानबटार में आयोजित 17वें COP17 सम्मेलन में सूखे से निपटने के लिए कोई वैश्विक ढांचा तो नहीं बन सका, लेकिन लैंड रेस्टोरेशन के लिए **$1.3 अरब** की नई फंडिंग जुटाने में कामयाबी मिली है। यह बदलाव भविष्य में वॉटर मैनेजमेंट और सस्टेनेबल एग्रीकल्चर सेक्टर में निवेश की नई राह खोल सकता है।
फाइनेंशियल फ्लो और पॉलिसी का पेंच
COP17 सम्मेलन में कानूनी रूप से बाध्यकारी 'ड्रॉट प्रोटोकॉल' (Drought Protocol) पर सहमति न बन पाना एक बड़ा झटका है, जिसका मुख्य कारण अमेरिका का बहुपक्षीय दायित्वों के बजाय घरेलू और द्विपक्षीय रणनीतियों पर जोर देना रहा। हालांकि, इस बीच Drought Resilience Investment Facility (DRIF) जैसी नई तकनीकी और वित्तीय प्रणालियों को पेश किया गया है, जिसके जरिए $40 करोड़ की पूंजी जुटाने का लक्ष्य है। निवेशकों के लिए यह एक स्पष्ट संकेत है कि क्लाइमेट स्पेस में अब 'ट्रीटी-बेस्ड' फैसलों के बजाय 'प्रोजेक्ट-लेवल' फाइनेंसिंग का बोलबाला रहेगा।
क्लाइमेट-सेंसिटिव सेक्टर पर असर
वैश्विक फ्रेमवर्क के न होने से एग्रिकल्चर, इरिगेशन, वाटर टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टर्स के लिए नीतिगत अनिश्चितता बनी रहेगी। कंपनियों को अब क्षेत्रीय आधार पर अलग-अलग पॉलिसी के हिसाब से काम करना होगा। हालांकि, Drought Resilience Index (DRI) की शुरुआत और सूखे को एजेंडा में प्राथमिकता देना यह बताता है कि वाटर और सॉइल डेटा का महत्व बढ़ रहा है। भविष्य में वाटर-सेविंग टेक्नोलॉजी और प्रिसिजन फार्मिंग (Precision Farming) मुहैया कराने वाली कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा होंगे।
COP18 की ओर नजरें
अब ग्लोबल ड्रॉट मैनेजमेंट पर औपचारिक चर्चा 2028 में मिस्र में होने वाले COP18 तक टल गई है। तब तक, मार्केट में 'रिएक्टिव' फंडिंग मॉडल का प्रभाव बना रहेगा। इन्वेस्टर्स को अब यह देखना होगा कि इस $1.3 अरब की राशि का वितरण कैसे होता है और क्या नई तकनीकी पहलें प्राइवेट सेक्टर को वाटर और सॉइल रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट्स में खींचने में सफल होती हैं या नहीं।
