भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) Surya Kant ने वैश्विक वित्तीय सुरक्षा पर चिंता जताते हुए कहा है कि दुनिया भर में पकड़े जाने वाले अवैध धन की रिकवरी दर **1%** से भी कम है। उन्होंने मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया है।
अवैध धन का विशाल नेटवर्क
कैम्ब्रिज में आयोजित 43वें इंटरनेशनल सिम्पोजियम ऑन इकोनॉमिक क्राइम के दौरान CJI Surya Kant ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि हर साल होने वाला मनी लॉन्ड्रिंग का प्रवाह इतना बड़ा है कि दुनिया की 8 अरब की आबादी में हर व्यक्ति को एक लैपटॉप दिया जा सकता है। इतनी बड़ी मात्रा के बावजूद, रिकवरी रेट का 1% से नीचे रहना यह दर्शाता है कि मौजूदा वैश्विक नियम और प्रवर्तन एजेंसियां वित्तीय अपराधों की रफ्तार के साथ कदम नहीं मिला पा रही हैं।
कानूनी और संस्थागत चुनौतियां
Justice Kant ने उन ढांचागत बाधाओं पर चर्चा की जो संपत्ति की रिकवरी में रोड़ा बनती हैं। हालांकि भारत में PMLA 2002 और फ्यूजिटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर्स एक्ट 2018 जैसे सख्त कानून मौजूद हैं, लेकिन जब अपराध का दायरा कई देशों में फैल जाता है, तो घरेलू कानून सीमित हो जाते हैं। अपराधी बहुत तेजी से संपत्ति को एक देश से दूसरे देश में ट्रांसफर कर देते हैं, जिससे उसे ट्रैक और फ्रीज करना मुश्किल हो जाता है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग क्यों जरूरी?
CJI ने सुझाव दिया कि केवल आर्थिक अपराधियों के प्रत्यर्पण (extradition) पर ध्यान देने से काम नहीं चलेगा। इसके बजाय, Mutual Legal Assistance Treaties (MLATs) को मजबूत करना और देशों के बीच फाइनेंशियल इंटेलिजेंस साझा करना समय की मांग है। उन्होंने कहा कि संपत्ति को फ्रीज करना और उसे वापस लाने की प्रक्रिया ही वित्तीय अपराधों को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है।
निवेशकों और बाजार के लिए मतलब
वित्तीय जगत के लिए यह स्थिति एक बड़ी चेतावनी है। मनी लॉन्ड्रिंग जैसे अपराध बैंकिंग सेक्टर और मार्केट की इंटीग्रिटी के लिए बड़ा जोखिम पैदा करते हैं। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पारदर्शिता और बेहतर सहयोग नहीं बढ़ेगा, तब तक वित्तीय संस्थानों पर दबाव बना रहेगा और नियमों की सख्ती (Compliance) और कड़ी होती जाएगी।
