मुख्य आर्थिक सलाहकार V. Anantha Nageswaran ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल ब्लॉक्स के बीच भारत की तटस्थ (neutral) बनी रहने की नीति अब महंगी साबित हो रही है। उन्होंने साफ कहा कि अब 'ग्लोबल डिसइन्फ्लेशन' का दौर खत्म हो चुका है, जिससे देश को अपनी मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी में बड़े बदलाव करने होंगे।
भू-राजनीतिक दबाव और बढ़ती चुनौतियां
13वें PAFI एनुअल फोरम में बोलते हुए, V. Anantha Nageswaran ने स्पष्ट किया कि अब दुनिया पहले जैसी सहकारी नहीं रही। ग्लोबल पावर्स के बीच अपना संतुलन बनाए रखने की कोशिश, जिसे 'हेजिंग' (hedging) कहा जाता है, अब पहले जैसी आसान नहीं है। एनर्जी, टेक्नोलॉजी और ट्रेड अब राजनीतिक हथियार बन चुके हैं, जिसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।
डिसइन्फ्लेशन का दौर खत्म
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी खबर यह है कि वह दौर अब बीत चुका है जब दुनिया में सामान सस्ता और स्थिर रहता था। चिप रेशनिंग, एक्सपोर्ट कंट्रोल्स और मिनरल्स का राजनीतिकरण होने से ग्लोबल सप्लाई चेन पर भारी जोखिम मंडरा रहा है। जो कंपनियां इंपोर्ट पर ज्यादा निर्भर हैं, उनके लिए इनपुट कॉस्ट बढ़ना तय है। ऐसे में पूरा फोकस अब डिमांड मैनेजमेंट से हटकर 'सप्लाई-साइड' को मजबूत करने पर शिफ्ट हो रहा है।
सरकार की रणनीति और PLI का महत्व
इस संकट से बचने का एकमात्र रास्ता 'आत्मनिर्भरता' है। सरकार अपनी PLI स्कीम्स के जरिए इलेक्ट्रॉनिक्स, डिफेंस, केमिकल्स और फार्मा जैसे सेक्टर्स में घरेलू क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रही है। जिन कंपनियों ने अपने कच्चे माल (raw materials) के लिए 'बैकवर्ड इंटीग्रेशन' किया है, वे आने वाले समय में ग्लोबल वोलेटिलिटी से बेहतर तरीके से निपट सकेंगी।
कहां है जोखिम?
नगेस्वरन ने इस बात पर भी चिंता जताई कि भारत के पास अभी भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अन्य क्षेत्रों में फाऊंडेशनल इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी की कमी है। इसके अलावा, एनर्जी मार्केट में अस्थिरता और अमेरिका जैसे देशों द्वारा लाए जा रहे ट्रेड रिस्ट्रिक्शंस (जैसे US Graham Act) कंपनियों के लिए सीधे तौर पर ऑपरेशनल रिस्क पैदा करते हैं। अब बाजार की नजर इस बात पर होगी कि सरकार अपनी पॉलिसीज को कैसे रिफाइन करती है ताकि सप्लाई-साइड की बाधाओं को दूर किया जा सके।
