CBI ने Food Corporation of India (FCI) और North Eastern Regional Agricultural Marketing Corporation (NERAMAC) के अधिकारियों समेत 8 लोगों पर FIR दर्ज की है। मामला ₹28.87 करोड़ के चावल डायवर्जन स्कैम से जुड़ा है, जहां सरकारी अनाज को जरूरतमंदों तक पहुंचाने के बजाय प्राइवेट ट्रेडर्स को बेचा गया।
सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल कर अनाज घोटाले की साजिश रची गई है। CBI के मुताबिक, यह पूरा खेल 'ओपन मार्केट सेल स्कीम' (OMSS) के तहत हुआ, जिसे गरीबों को सस्ता अनाज मुहैया कराने के लिए बनाया गया था, लेकिन इस सरकारी सिस्टम को दरकिनार कर सब्सिडी वाले अनाज को प्राइवेट मार्केट में खपा दिया गया।
कैसे हुआ घोटाला?
जांच में सामने आया है कि अप्रैल से मई 2026 के बीच FCI दिल्ली रीजन ने बिना किसी ई-ऑक्शन प्रक्रिया के NERAMAC को 50,645 मीट्रिक टन चावल जारी कर दिए। नियमों के अनुसार, NERAMAC इस आवंटन के लिए पात्र ही नहीं था, फिर भी अधिकारियों ने इसे रिकॉर्ड समय में मंजूरी दे दी।
सरकारी खजाने को करोड़ों का नुकसान
इस घोटाले से सरकारी खजाने को सीधे तौर पर ₹28.87 करोड़ का फटका लगा है। यह नुकसान उस कीमत के अंतर से आंका गया है जिस पर चावल NERAMAC को दिया गया (₹23,200 प्रति मीट्रिक टन) और जो बाजार की रिजर्व कीमत (₹28,900 प्रति मीट्रिक टन) थी।
निजी कंपनियों की भूमिका
CBI ने इस मामले में Utapalakshi Agro Products, Dibesh Commercials और Super Grains जैसी प्राइवेट कंपनियों की संलिप्तता का पता लगाया है। इन फर्मों ने मध्यस्थ के रूप में काम करते हुए नरेला, घेवरा और मायापुरी के डिपो से सीधे अनाज उठाया। जालसाजी इतनी गहरी थी कि फर्जी रिकॉर्ड बनाए गए ताकि यह दिखाया जा सके कि अनाज रिटेल आउटलेट्स तक पहुंचा है, जबकि असल में इसे ऊंचे दामों पर प्राइवेट मार्केट में बेच दिया गया।
अब निवेशकों और सेक्टर के जानकारों की नजर इस बात पर है कि क्या सरकार इसके बाद ई-ऑक्शन प्रोटोकॉल और सरकारी निगमों के इंटरनल ऑडिट नियमों में कोई बड़े बदलाव करेगी या नहीं।
