US-Iran के बीच बढ़ते तनाव की वजह से Brent Crude ऑयल **$106** प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है, जिससे ग्लोबल महंगाई की चिंताएं बढ़ गई हैं। भारतीय निवेशकों के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि तेल की कीमतों का सीधा असर रुपये की वैल्यू और घरेलू महंगाई पर पड़ता है। साथ ही, US Bond Yields के **2004** के उच्चतम स्तर पर पहुंचने से विदेशी निवेश (FII) के भारत से बाहर जाने का खतरा बढ़ गया है।
तेल की आग और भारतीय अर्थव्यवस्था
ग्लोबल मार्केट में एनर्जी कॉस्ट में जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है। Brent Crude में 1.6% की तेजी के साथ यह $106 प्रति बैरल पर पहुंच चुका है। भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में तेल के महंगे होने से डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे रुपया कमजोर होता है और देश में महंगाई का दबाव बनता है।
US Fed का रुख और बॉन्ड यील्ड का गणित
अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखने की संभावना ने बाजार को डरा दिया है। अक्टूबर में रेट हाइक की संभावना 66% आंकी गई है। इसका नतीजा यह हुआ है कि US Treasury Yields 5.5185% पर पहुंच गई हैं, जो 2004 के बाद का उच्चतम स्तर है। जब अमेरिकी बॉन्ड सुरक्षित और बेहतर रिटर्न देते हैं, तो विदेशी निवेशक अक्सर भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स से पैसा निकालकर वहां शिफ्ट कर देते हैं, जिससे FII फ्लो कम हो जाता है।
निवेशकों के लिए किन सेक्टर्स पर रखें नजर?
इस ग्लोबल हलचल के बीच भारतीय निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है। कच्चा तेल कच्चा माल (Raw Material) के रूप में इस्तेमाल करने वाले सेक्टर्स जैसे पेंट्स, टायर और एविएशन पर मार्जिन का दबाव बढ़ सकता है। वहीं, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के लिए भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।
आने वाले दिनों में निवेशकों को US के सितंबर मंथ के पेरोल डेटा पर खास नजर रखनी चाहिए। यह रिपोर्ट अमेरिकी लेबर मार्केट की स्थिति बताएगी, जो फेडरल रिजर्व के अगले फैसलों की दिशा तय करेगी।
