ग्लोबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड का भाव **$107** प्रति बैरल के पार जाने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। कच्चे तेल में इस तेजी का असर रुपये पर भी दिखा है, जो डॉलर के मुकाबले फिसलकर **96** के स्तर तक पहुंच गया है।
ग्लोबल लेवल पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 89% आयात करता है, ऐसे में क्रूड का दाम $107 होने से हमारा इम्पोर्ट बिल सीधा बढ़ गया है, जिसका दबाव सीधे भारतीय रुपये पर दिख रहा है।
OMCs पर मार्जिन का दबाव
ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के लिए स्थिति बेहद गंभीर है। इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने के लिए हर दिन लगभग ₹530 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ रहा है। अगर यही स्थिति बनी रही, तो फाइनेंशियल ईयर के अंत तक इन कंपनियों का कुल अंडर-रिकवरी घाटा ₹64,000 करोड़ तक पहुंच सकता है।
सेक्टर पर असर और FPI का रुख
कच्चे तेल पर आधारित अन्य सेक्टर जैसे एविएशन, टायर, प्लास्टिक और केमिकल्स की लागत तेजी से बढ़ रही है। बढ़ती लागत को ग्राहकों पर डालने में कंपनियां संघर्ष कर रही हैं, जिससे उनके मुनाफे पर असर पड़ रहा है।
इसके साथ ही, विदेशी निवेशकों (FPIs) ने भारतीय बाजारों से दूरी बनानी शुरू कर दी है। एक ही सेशन में FPIs ने ₹5,353 करोड़ की बिकवाली की है। इसका एक बड़ा कारण अमेरिकी 10-ईयर ट्रेजरी यील्ड का 5.24% पर पहुंचना है, जिसके कारण ग्लोबल इन्वेस्टर उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित डॉलर एसेट्स की ओर भाग रहे हैं। अब बाजार की नजर सरकार के आगामी फैसलों और कंपनियों के क्वार्टरली रिजल्ट्स पर टिकी है कि वे इस लागत के दबाव को कैसे मैनेज करते हैं।
