बढ़ती बॉन्ड यील्ड भारतीय कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा बना रही है, जिससे मुनाफे पर दबाव बन सकता है। वहीं, स्टील और सीमेंट जैसे एक्सपोर्टर्स के लिए UK के नए कार्बन टैक्स (CBAM) ने चिंताएं बढ़ा दी हैं।
सरकारी बॉन्ड यील्ड में तेजी का असर अब इकोनॉमी पर दिखने लगा है। ग्लोबल अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण यील्ड ऊपर जा रही है। जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो कॉर्पोरेट लोन भी महंगे हो जाते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि जिन कंपनियों पर कर्ज का बोझ ज्यादा है, उनका ब्याज खर्च बढ़ सकता है, जिससे आगामी तिमाही में उनके नेट प्रॉफिट पर असर पड़ना तय है। मार्केट एक्सपर्ट्स अब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के अगले कदमों और लिक्विडिटी मैनेजमेंट पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।
एक्सपोर्ट्स पर नई चुनौतियों का साया
व्यापारिक मोर्चे पर, UK की ओर से लागू होने वाला 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) भारतीय कंपनियों के लिए सिरदर्द बन गया है। 1 जनवरी, 2027 से लागू होने वाले इस नियम का असर स्टील, सीमेंट, एल्युमीनियम, फर्टिलाइजर और हाइड्रोजन जैसे सेक्टरों पर सबसे ज्यादा पड़ेगा। कंपनियां अभी भी सरकार से राहत के उपायों की उम्मीद कर रही हैं ताकि वे यूरोपीय बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धा बरकरार रख सकें।
रेगुलेटरी अनुपालन का दबाव
इसके अलावा, 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023' के तहत कड़े डेटा नियमों ने भी चिंताएं पैदा की हैं। कंपनियां अब अपने सिस्टम को नए कानूनों के साथ अलाइन करने में जुटी हैं, जिससे ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ सकती है। कुल मिलाकर, फाइनेंशियल ईयर 2027 की दूसरी छमाही में निवेशकों को कंपनियों के डेट लेवल और एक्सपोर्ट मार्जिन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
