शेयर बाजार और बॉन्ड मार्केट के बीच बढ़ती खाई निवेशकों के लिए चिंता का सबब बन रही है। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड **5.36%** के **24-वर्षीय** उच्च स्तर पर पहुंच गई है, जो इक्विटी मार्केट में बड़ी उठापटक के संकेत दे रही है।
फिलहाल दुनिया भर के फाइनेंशियल मार्केट्स दो अलग-अलग दिशाओं में चलते दिख रहे हैं। एक तरफ जहां शेयर बाजार शांत नजर आ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बॉन्ड मार्केट में भारी तनाव बना हुआ है। 'MOVE Index', जो अमेरिकी ट्रेजरी में अस्थिरता को मापता है, इस साल तेजी से ऊपर गया है। यह साफ तौर पर बताता है कि ब्याज दरों और सरकारी कर्ज की जरूरतों को लेकर मार्केट में काफी घबराहट है।
सबसे अहम बात यह है कि अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड की यील्ड 5.36% तक पहुंच गई है। साल 2002 के बाद यह पहली बार है जब कैपिटल कॉस्ट इतनी महंगी हुई है। इतिहास गवाह है कि जब-जब बॉन्ड मार्केट में अनिश्चितता चरम पर होती है, उसका दबाव अंत में शेयर बाजारों पर पड़ता ही है। अभी तक शेयर बाजार इस जोखिम को नजरअंदाज कर रहे हैं, लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिन तक बने रहने की उम्मीद कम है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
जब अमेरिकी बॉन्ड से मिलने वाला रिटर्न (Yield) इतना आकर्षक हो जाता है, तो ग्लोबल निवेशक भारतीय जैसे इमर्जिंग मार्केट्स से पैसा निकालकर सुरक्षित अमेरिकी बॉन्ड में लगाना पसंद करते हैं। इससे FIIs (Foreign Institutional Investors) की बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है, जिसका असर भारतीय शेयर बाजार और रुपये की चाल पर पड़ना तय है।
अन्य चुनौतियां:
- क्रूड ऑयल: ब्रेंट क्रूड $102 प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है, जो महंगाई को काबू में नहीं आने दे रहा है।
- मार्केट रैली का दायरा: अभी की तेजी सिर्फ चंद दिग्गज टेक कंपनियों के भरोसे चल रही है। अगर इन लीडिंग कंपनियों पर दबाव आया, तो ब्रॉडर मार्केट में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है।
आने वाले हफ्तों में निवेशकों को FII फ्लो और अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों पर खास नजर रखनी होगी, क्योंकि यही तय करेंगे कि बॉन्ड मार्केट का यह तनाव कब इक्विटी मार्केट को अपनी चपेट में लेगा।
