आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब केवल एक तकनीकी फीचर नहीं, बल्कि भारतीय कंपनियों के लिए एक गंभीर 'एंटरप्राइज रिस्क' बन चुका है। निवेशकों को अब यह बारीकी से देखना होगा कि कंपनियां AI गवर्नेंस को बोर्ड लेवल पर कैसे मैनेज कर रही हैं, खासकर बैंकिंग और फाइनेंस जैसे सेक्टर में।
भारतीय कॉरपोरेट जगत में AI की भूमिका पूरी तरह बदल चुकी है। अब तक इसे केवल तकनीकी टीमें दक्षता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करती थीं, लेकिन आज AI मॉडल क्रेडिट स्कोरिंग, लोन अप्रूवल और फ्रॉड डिटेक्शन जैसे महत्वपूर्ण काम संभाल रहे हैं। इसका मतलब है कि अब यह केवल CTO के दफ्तर का मुद्दा नहीं, बल्कि बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के स्तर पर निगरानी का विषय बन गया है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को अब कंपनियों के परफॉरमेंस को देखने का नजरिया बदलना होगा। बिना बोर्ड-लेवल गवर्नेंस के काम करने वाले AI सिस्टम से रेगुलेटरी उल्लंघन, वित्तीय नुकसान और कंपनी की साख पर 100% खतरा हो सकता है। खास तौर पर BFSI (बैंकिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज और इंश्योरेंस) सेक्टर में, जहां निर्णय प्रक्रिया पूरी तरह ऑटोमेटेड है, वहां जोखिम बहुत अधिक है।
RBI का कड़ा रुख
भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने साफ कर दिया है कि AI सिस्टम में निष्पक्षता (fairness) और जवाबदेही बहुत जरूरी है। अब फाइनेंशियल संस्थानों को केवल 'एथिक्स' की बातें नहीं, बल्कि AI सिस्टम की निरंतर मॉनिटरिंग (Continuous Monitoring) करनी होगी।
क्यों जरूरी है सही गवर्नेंस?
अक्सर कंपनियां गवर्नेंस को इनोवेशन में बाधा मानती हैं, लेकिन यह सोच गलत है। जो कंपनियां शुरुआत में ही सुरक्षा और ऑडिटिंग के मानक तय नहीं करतीं, उन्हें बाद में सिस्टम को रिस्ट्रक्चर करने में बहुत अधिक लागत और समय गंवाना पड़ता है। निवेशकों को सालाना रिपोर्ट और फाइलिंग्स में यह देखना चाहिए कि क्या कंपनी के बोर्ड में AI रिस्क को लेकर स्पष्ट जवाबदेही तय है या नहीं। जो कंपनियां इस ढांचे को मजबूत कर रही हैं, वही भविष्य में लॉन्ग-टर्म स्थिरता बनाए रखेंगी।
