नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने जा रहे BRICS समिट में भारत और चीन के बीच बढ़ते व्यापार घाटे (Trade Deficit) पर बड़ी चर्चा होने की उम्मीद है। निवेशक इस घटनाक्रम पर बारीक नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि यह भविष्य की सप्लाई चेन और निवेश से जुड़े नियमों को प्रभावित कर सकता है।
व्यापार असंतुलन पर फोकस
भारत और चीन के बीच का आर्थिक रिश्ता इस वक्त एक नाजुक दौर से गुजर रहा है। साल 2025 में दोनों देशों के बीच का व्यापार घाटा $100 बिलियन के आंकड़े को पार कर गया था और 2026 की पहली छमाही में भी इसमें बढ़ोतरी जारी रही है। इसका सीधा असर भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ रहा है, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक्स और लिथियम-आयन बैटरी जैसे जरूरी कलपुर्जों के लिए भारतीय कंपनियां काफी हद तक चीन पर निर्भर हैं। जयपुर में हाल ही में हुई 16वीं BRICS ट्रेड मिनिस्टर्स मीटिंग में भी ग्लोबल वैल्यू चेन को मजबूत बनाने और ट्रांजेक्शन कॉस्ट को कम करने पर जोर दिया गया था, जिससे संकेत मिलता है कि समिट में आर्थिक कनेक्टिविटी मुख्य मुद्दा होगी।
निवेश और सुरक्षा जांच (Security Vetting)
निवेशकों के लिए इस समिट का सबसे अहम हिस्सा निवेश नीतियों में बदलाव की संभावना है। नई दिल्ली विदेशी पूंजी को लेकर काफी सतर्क रुख अपना रही है, खासकर उन क्षेत्रों में जो रणनीतिक सुरक्षा से जुड़े हैं। बाजार इस बात की निगरानी कर रहा है कि क्या सरकार गैर-रणनीतिक क्षेत्रों के लिए मंजूरी प्रक्रियाओं (Approval Processes) को आसान बनाएगी। यह कदम उन कंपनियों के लिए गेम-चेंजर हो सकता है जो क्रॉस-बॉर्डर कैपिटल या सप्लाई चेन पर निर्भर हैं।
मार्केट और सेक्टर पर असर
इलेक्ट्रॉनिक्स, एनर्जी स्टोरेज और इंडस्ट्रियल मशीनरी ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर इस समिट के निर्णयों का सीधा असर पड़ सकता है। व्यापारिक बाधाओं या निवेश के नियमों में किसी भी बदलाव से इन सेक्टरों की कंपनियों की ऑपरेशनल कॉस्ट में उतार-चढ़ाव आ सकता है। इसके अलावा, ब्रिक्स देशों के बीच डिजिटल करेंसी और डी-डॉलरइजेशन (De-dollarization) पर हो रही बातचीत भी एक बड़ा रणनीतिक बदलाव है, जिसे एनालिस्ट भविष्य की ट्रेड एफिशिएंसी के लिहाज से देख रहे हैं।
आगे क्या देखना होगा?
समिट के बाद वित्त मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय की ओर से जारी होने वाले आधिकारिक बयानों पर सबकी निगाहें होंगी। क्या निवेश मंजूरी को लेकर कोई क्लैरिटी आएगी? क्या कच्चे माल के लिए ट्रेड प्रोटोकॉल में कोई बदलाव होगा? ये वो सवाल हैं जिनके जवाब भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के लिए उनके विस्तार की योजनाएं तय करेंगे।
