BRICS Summit 2026: एनर्जी मार्केट पर दबदबा, लेकिन अंदरूनी कलह से घिरे सदस्य

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
BRICS Summit 2026: एनर्जी मार्केट पर दबदबा, लेकिन अंदरूनी कलह से घिरे सदस्य

नई दिल्ली में चल रहे BRICS शिखर सम्मेलन में **11** देशों का समूह दुनिया के **42%** क्रूड प्रोडक्शन को नियंत्रित करता है। हालांकि, सदस्यों के बीच आपसी तनाव इस गठबंधन की एकजूटता और प्रभावशीलता के लिए बड़ा खतरा बन गया है।

नई दिल्ली में 18वां BRICS शिखर सम्मेलन शुरू हो चुका है, जहाँ 12 और 13 सितंबर, 2026 को सदस्य देशों के प्रमुख जुट रहे हैं। यह 11 देशों का विस्तार अब ग्लोबल एनर्जी लैंडस्केप में काफी वजन रखता है, जो कुल क्रूड प्रोडक्शन का लगभग 42% और नेचुरल गैस रिजर्व का लगभग आधा हिस्सा कंट्रोल करता है। बावजूद इसके, सम्मेलन में एक साझा नीति बनाने को लेकर बड़ी चुनौतियां सामने दिख रही हैं।

अब इस समूह में ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और UAE शामिल हैं। निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह गठबंधन अपने अलग-अलग हितों को एक साथ ला पाएगा। खासतौर पर ईरान और UAE के बीच पश्चिम एशिया में चल रहे संकट को लेकर मतभेद के कारण संयुक्त घोषणापत्र पर आम सहमति बनाना मुश्किल हो गया है।

ग्लोबल एनर्जी और ट्रेड पर असर

निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि वर्तमान में यह समूह किसी एक ठोस मार्केट-इन्फ्लुएंसिंग फोर्स की तरह काम करने के बजाय अलग-अलग देशों के एक समूह की तरह व्यवहार कर रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे क्षेत्रों में क्षेत्रीय संघर्ष एनर्जी इम्पोर्टर्स के लिए अनिश्चितता पैदा कर रहे हैं। बिना किसी समन्वित (coordinated) मैंडेट के, यह समूह ग्लोबल सप्लाई झटकों के दौरान स्थिरता प्रदान करने में सीमित है।

समिट का दूसरा बड़ा फोकस फाइनेंशियल ट्रेड में स्ट्रक्चरल बदलाव है। सदस्य देश अब क्रॉस-बॉर्डर ट्रेड के लिए लोकल करेंसी को प्राथमिकता दे रहे हैं और वैकल्पिक फाइनेंसिंग सिस्टम तलाश रहे हैं। यह कदम अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ जैसे बाहरी आर्थिक दबावों से बचने की एक रणनीति है। डी-डॉलराइजेशन की ओर बढ़कर ये देश अपनी कमोडिटी ट्रेड को पश्चिमी फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर से सुरक्षित करना चाहते हैं।

निवेशकों के लिए क्या है अहम?

BRICS का असली असर ऑयल कोटा में बदलाव के बजाय लॉन्ग-टर्म कमोडिटी सेटलमेंट्स में दिखेगा। मार्केट पार्टिसिपेंट्स को यह देखना होगा कि क्या समिट में कॉमन पेमेंट फ्रेमवर्क पर कोई ठोस प्रगति होती है या नहीं। फिलहाल, ऊर्जा बाजारों पर समूह का प्रभाव काफी हद तक सैद्धांतिक है, क्योंकि सामूहिक समझौतों के बजाय व्यक्तिगत राष्ट्रीय हित ही नीतियों को निर्धारित कर रहे हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.