BRICS देशों ने सितंबर 2026 के नई दिल्ली घोषणापत्र में यूरोपीय संघ (EU) के 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) का खुलकर विरोध किया है। हालांकि, EU द्वारा तैयार उत्पादों पर टैक्स बढ़ाने की योजना से भारतीय निर्माताओं की लागत और जोखिम दोनों में इजाफा होना तय है।
नई दिल्ली में आयोजित 2026 BRICS समिट में सदस्य देशों ने यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन टैक्स को 'भेदभावपूर्ण ट्रेड बाधा' करार दिया है। हालांकि, इस कूटनीतिक विरोध के बावजूद भारतीय निर्यातकों के लिए जमीनी हकीकत नहीं बदली है, क्योंकि 1 जनवरी 2026 से EU का कार्बन-टैक्स सिस्टम पूरी तरह लागू है। इस सिस्टम के तहत स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट जैसे सामानों के उत्पादन में उत्सर्जित कार्बन के आधार पर शुल्क लिया जा रहा है।
कंपनियों के लिए क्या हैं नए जोखिम?
BRICS भले ही अब 'BRICS कार्बन मार्केट्स पार्टनरशिप' के जरिए आपसी सहयोग की बात कर रहा हो, लेकिन इससे भारतीय कंपनियों को EU के सख्त नियमों से कोई राहत नहीं मिलेगी। निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि EU अब CBAM को केवल कच्चे माल तक सीमित न रखकर इसे फिनिश्ड गुड्स (तैयार उत्पादों) तक फैलाने की योजना बना रहा है।
यदि मशीनरी और अन्य कंज्यूमर गुड्स इसके दायरे में आते हैं, तो प्रभावित होने वाली भारतीय कंपनियों की संख्या में भारी उछाल आएगा। इससे कंपनियों को केवल फैक्ट्री लेवल पर ही नहीं, बल्कि पूरी सप्लाई चेन में कार्बन उत्सर्जन का ट्रैक रिकॉर्ड रखना होगा।
वित्तीय बोझ और मार्जिन पर असर
भारतीय व्यवसायों के लिए असली चुनौती सिर्फ टैक्स नहीं, बल्कि 'एम्बेडेड कार्बन' का डेटा सत्यापित (verify) कराना है। छोटे उद्योगों के लिए स्वतंत्र ऑडिट का खर्च उठाना एक बड़ी बाधा बन गया है। यदि कंपनियां इन कड़े मानकों पर खरी नहीं उतरती हैं, तो वैश्विक बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है। अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि क्या भारतीय एक्सपोर्टर्स अपनी ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) सुधारकर लागत को मैनेज कर पाएंगे, या फिर उन्हें यह अतिरिक्त बोझ अपने मुनाफे से वहन करना होगा।
