BRICS+ का बड़ा फैसला: अब कॉमन करेंसी नहीं, पेमेंट नेटवर्क पर रहेगा फोकस

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
BRICS+ का बड़ा फैसला: अब कॉमन करेंसी नहीं, पेमेंट नेटवर्क पर रहेगा फोकस

BRICS+ देशों ने साझा करेंसी (Common Currency) बनाने की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। इसके बजाय, अब पूरा जोर एक इंटीग्रेटेड क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट नेटवर्क बनाने पर है, ताकि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम की जा सके।

क्यों रुकी कॉमन करेंसी की राह?

BRICS+ देशों ने अब यह मान लिया है कि एक साझा करेंसी लॉन्च करना फिलहाल मुमकिन नहीं है। 'BRICS+ Thinking' ग्रुप की हालिया रिपोर्ट में ग्रेगरी टी. चिन, डैनी क्वा और जिम ओ'नील जैसे अर्थशास्त्रियों ने साफ किया है कि इसके लिए सदस्य देशों को अपनी मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) पर नियंत्रण छोड़ना होगा। कोई भी देश अपनी ब्याज दरें और महंगाई दर को किसी और को सौंपने के लिए तैयार नहीं है।

अब क्या है नया प्लान?

साझा करेंसी के बजाय, अब फोकस 'क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट मैकेनिज्म' पर है। इसका मकसद सदस्य देशों की बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को आपस में जोड़ना है। एक डिजिटल ब्रिज के जरिए, ट्रेड सेटलमेंट को डॉलर की मध्यस्थता के बिना ही तेज और सस्ता बनाया जा सकेगा। रूस पर लगे 2022 के प्रतिबंधों के बाद, कई देश अब खुद को पश्चिमी वित्तीय दबावों से बचाने के लिए इस ओर रुख कर रहे हैं।

भारत का रुख और चुनौतियां

भारत शुरू से ही लोकल करेंसी में ट्रेड को मजबूत करने की वकालत करता रहा है। भारत अपने UPI जैसे सिस्टम को दूसरे देशों के साथ जोड़कर एक सुरक्षित पेमेंट नेटवर्क तैयार करने पर काम कर रहा है। हालांकि, राह आसान नहीं है। अमेरिकी सरकार की तरफ से उन देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की चेतावनी दी गई है जो डॉलर से दूर हटेंगे। यह व्यापारिक तनाव इस प्रोजेक्ट को भविष्य में काफी जटिल बना सकता है।

निवेशकों के लिए संकेत

निवेशकों को अब इन देशों के सेंट्रल बैंकों की प्रगति रिपोर्ट और लोकल करेंसी ट्रेड वॉल्यूम पर नजर रखनी चाहिए। साझा करेंसी का विचार भले ही खारिज हो गया हो, लेकिन यह प्राइवेट पेमेंट नेटवर्क भविष्य में ग्लोबल ट्रेड के तरीकों को पूरी तरह बदल सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.