नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में 'सर्कुलर इकोनॉमी' लागू करने पर सहमति जताई है। इस बड़े बदलाव से सरकारी टेंडर और कंस्ट्रक्शन कंपनियों की लागत पर सीधा असर पड़ सकता है।
नई दिल्ली में संपन्न हुए 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को लेकर एक बड़ी नीतिगत घोषणा की गई है। सदस्य देशों ने अब बड़े प्रोजेक्ट्स में 'सर्कुलर इकोनॉमी' के सिद्धांतों को जोड़ने का संकल्प लिया है, जिसका उद्देश्य निर्माण कार्यों में बर्बादी को कम करना और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना है।
कंपनियों पर क्या होगा असर?
पारंपरिक निर्माण मॉडल अब बदलने वाला है। भविष्य में प्रोजेक्ट्स ऐसे डिजाइन किए जाएंगे जिनमें कच्चे माल की खपत कम हो और रिसाइकिल मैटेरियल का ज्यादा इस्तेमाल हो। भारतीय बाजार के लिहाज से देखें, तो इसके संकेत सरकारी प्रोक्योरमेंट पॉलिसी और टेंडर दस्तावेजों में जल्द दिखाई देने लगेंगे। आने वाले प्रोजेक्ट्स में ठेकेदारों को कार्बन-कुशल सामग्री (carbon-efficient materials) और एडवांस लॉजिस्टिक्स समाधानों के सख्त मानकों का पालन करना होगा।
निवेशकों के लिए सावधानी
कंस्ट्रक्शन और इंजीनियरिंग सेक्टर की कंपनियों के लिए यह नीति दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ यह ऑपरेशनल एफिशिएंसी बढ़ाएगी, तो दूसरी तरफ शुरुआती कैपिटल एक्सपेंडिचर बढ़ सकता है। जो कंपनियां ESG नियमों को जल्दी अपना लेंगी, उन्हें सरकारी टेंडर्स में बढ़त मिल सकती है। हालांकि, निवेशकों को मार्जिन पर पड़ने वाले दबाव को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर तब जब अनुपालन लागत (compliance cost) सरकार के बजट से ज्यादा तेजी से बढ़े।
फिलहाल, निवेशकों को अगली तिमाहियों में आने वाले टेंडर क्लॉज पर नजर रखनी चाहिए। यह स्पष्ट होना बाकी है कि सरकार इस बदलाव के लिए सब्सिडी देगी या सारा खर्च ठेकेदारों को खुद उठाना होगा।
