BRICS देशों ने भारत की अगुवाई में दो स्थायी वर्किंग ग्रुप्स का गठन किया है। इसका मुख्य उद्देश्य इंटरनेशनल टैक्सेशन, ट्रांसफर प्राइसिंग और रेवेन्यू डेटा को स्टैंडर्डाइज करना है, जिससे डिजिटल टैक्स पर सदस्य देशों की मोलभाव करने की ताकत बढ़ेगी।
BRICS गठबंधन ने इंटरनेशनल टैक्स पॉलिसी पर अपना रुख साफ करने के लिए दो विशेष वर्किंग ग्रुप्स की शुरुआत की है। नई दिल्ली में सितंबर 2026 के अंत में आयोजित 'BRICS हेड्स ऑफ टैक्स अथॉरिटीज' की बैठक में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इनका ऐलान किया। ये ग्रुप्स अब 11 सदस्य देशों के बीच सहयोग को संस्थागत रूप देंगे।
ये ग्रुप्स क्या करेंगे काम?
इन दो ग्रुप्स का ध्यान मुख्य रूप से 'इंटरनेशनल टैक्सेशन एंड ट्रांसफर प्राइसिंग' और 'रेवेन्यू स्टैटिस्टिक्स' पर केंद्रित होगा। मौजूदा टैक्स सिस्टम अक्सर पुराने बिजनेस मॉडल्स के हिसाब से बने हैं, जो आधुनिक डिजिटल ऑपरेशंस को पकड़ने में नाकाम रहते हैं। चूंकि BRICS देशों का वैश्विक GDP में परचेजिंग पावर पैरिटी के आधार पर 39% का योगदान है, इसलिए यह पहल उभरती अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक मंच पर अपनी बात मजबूती से रखने में मदद करेगी।
इन्वेस्टर्स और कंपनियों के लिए क्या हैं मायने?
निवेशकों के लिए इसके दो बड़े असर हो सकते हैं:
- सकारात्मक: ट्रांसफर प्राइसिंग और विवाद सुलझाने के तरीकों में एकरूपता आने से मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए काम आसान हो सकता है। एडवांस प्राइसिंग एग्रीमेंट्स बेहतर होने से डबल टैक्सेशन का झंझट कम हो सकता है।
- जोखिम: सबसे बड़ा डर 'रेगुलेटरी डाइवर्जेंस' का है। अगर BRICS के टैक्स नियम OECD या UN के ग्लोबल मानकों से अलग होते हैं, तो वैश्विक कंपनियों को दो अलग-अलग नियमों का पालन करना पड़ सकता है। इसके अलावा, टैक्स विभाग अधिक आक्रामक तरीके से ट्रांसफर प्राइसिंग ऑडिट कर सकते हैं, जिससे विवाद बढ़ सकते हैं।
फिलहाल, इन ग्रुप्स की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कितनी जल्दी डेटा साझा करने की प्रक्रिया को जमीन पर उतारते हैं और क्या वे भविष्य में बाइंडिंग पॉलिसी लागू करने की ताकत रखते हैं या नहीं।
