इकोनॉमिस्ट सुरजीत भल्ला की हालिया रिसर्च में बड़ा खुलासा हुआ है कि BRICS देशों की ग्रोथ का सबसे बड़ा इंजन चीन है। चीन को हटा दें तो बाकी सदस्य देशों की ग्लोबल इनकम में कोई खास बदलाव नहीं आया है।
चीन का एकतरफा दबदबा
इकोनॉमिस्ट सुरजीत भल्ला का विश्लेषण बताता है कि पिछले 14 वर्षों में BRICS की ग्लोबल इनकम में जो भी इजाफा हुआ है, उसमें 72% योगदान सिर्फ चीन का है। एक्सपोर्ट के मामले में यह अंतर और भी गहरा है, जहां ब्लॉक के कुल गुड्स एक्सपोर्ट ग्रोथ में चीन की हिस्सेदारी 94% रही है। यदि चीन के आंकड़ों को अलग कर दिया जाए, तो बाकी सदस्यों की ग्लोबल इनकम शेयर 11.9% से घटकर 11.5% रह गई है, जो स्थिरता के बजाय ठहराव को दिखाती है।
देशों के प्रदर्शन में भारी अंतर
ग्रुप के भीतर आर्थिक हालात काफी असमान हैं। जहां इथियोपिया और चीन की प्रति व्यक्ति इनकम में लगभग 3 गुना इजाफा हुआ है, वहीं ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और ईरान जैसे देशों की स्थिति खराब हुई है। दक्षिण अफ्रीका की इनकम में तो 20% की गिरावट दर्ज की गई है। इससे साफ है कि इस ब्लॉक की मेंबरशिप सभी देशों के लिए समृद्धि का जरिया नहीं बनी है।
भारत की स्थिति क्या है?
भारत इस पूरे ग्रुप में एक 'पॉजिटिव आउटलायर' के रूप में उभरा है। 2011 में भारत का वर्ल्ड इनकम शेयर 2.5% था, जो 2025 में बढ़कर 3.5% हो गया है। हालांकि, यह कामयाबी BRICS की किसी नीति का नतीजा नहीं, बल्कि भारत के अपने घरेलू सुधारों और ग्लोबल ट्रेड इंटीग्रेशन का परिणाम है।
निवेशकों के लिए सबक
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी सीख यह है कि BRICS को एक आर्थिक गठबंधन के बजाय एक कूटनीतिक (Diplomatic) फोरम के तौर पर देखें। यहाँ कोई साझा बाजार या टैरिफ सुविधा नहीं है। भविष्य में निवेश के फैसले लेते समय ब्लॉक के नाम पर भरोसा करने के बजाय, संबंधित देश की अपनी ट्रेड पॉलिसी और घरेलू ग्रोथ के डेटा पर नजर रखना ज्यादा जरूरी है।
