BRICS अलायंस का दबदबा बढ़ने वाला है। 2031 तक यह समूह दुनिया की कुल इकोनॉमी का **28.5%** हिस्सा हो सकता है। नई दिल्ली में होने वाले 18वें समिट से पहले इंडिया की भूमिका को लेकर बड़े संकेत मिल रहे हैं।
आर्थिक रफ़्तार और आंकड़े
इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2031 तक BRICS देशों की सामूहिक जीडीपी $45.19 ट्रिलियन तक पहुंच सकती है। अगर हम परचेजिंग पावर पैरिटी (PPP) के आधार पर देखें, तो 11 देशों का यह गठबंधन पहले ही ग्लोबल जीडीपी का करीब 40% प्रतिनिधित्व करता है।
इंडिया की बढ़ती भूमिका
इस ब्लॉक में चीन अभी भी $20.65 ट्रिलियन की जीडीपी के साथ सबसे बड़ी शक्ति बना हुआ है। हालांकि, इंडिया एक प्रमुख 'ग्रोथ इंजन' के रूप में उभरा है। 2026 तक इंडिया की जीडीपी $4.15 ट्रिलियन के स्तर को छूने का अनुमान है। बाकी सदस्य देशों के मुकाबले इंडिया की तेज विकास दर समूह में उसकी हिस्सेदारी को और बढ़ाने वाली है।
निवेशकों के लिए जोखिम और चुनौतियां
ग्रोथ की इन उम्मीदों के बीच कुछ गंभीर चुनौतियां भी हैं जो निवेशकों को समझनी होंगी:
- इंटीग्रेशन की कमी: वर्तमान में BRICS देशों के बीच का आपसी व्यापार ग्लोबल ट्रेड का केवल 5% है, जो सप्लाई चेन के लिहाज से कम है।
- चीन पर निर्भरता: ग्रुप की कुल जीडीपी का लगभग दो-तिहाई हिस्सा चीन से आता है, जिससे एक बड़ी आर्थिक निर्भरता का जोखिम बना रहता है।
- नीतिगत अनिश्चितता: डी-डॉलराइजेशन (De-dollarization) और किसी कॉमन करेंसी पर आम सहमति न बन पाने के कारण इंटरनेशनल बिजनेस में अनिश्चितता बनी हुई है।
आने वाले समय में दिल्ली समिट में होने वाली चर्चाएं यह तय करेंगी कि सदस्य देश अपनी व्यापार नीतियों को कैसे आगे बढ़ाते हैं। निवेशकों की नजरें इस बात पर होनी चाहिए कि कैसे इंडिया और अन्य देश अपने ट्रेड को पारंपरिक भागीदारों से अलग कर नए सप्लाई चेन विकसित करते हैं।
