BRICS Delhi Summit 2026: पेमेंट सिस्टम को जोड़ने पर रहेगा जोर, जानें क्या है नई रणनीति

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AuthorAditya Rao|Published at:
BRICS Delhi Summit 2026: पेमेंट सिस्टम को जोड़ने पर रहेगा जोर, जानें क्या है नई रणनीति

12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले BRICS समिट में नेशनल डिजिटल पेमेंट और CBDC को लिंक करने पर मुख्य फोकस रहेगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इसका मकसद डी-डॉलराइजेशन नहीं, बल्कि ट्रेड कॉस्ट को कम करना है।

BRICS शिखर सम्मेलन 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है। इस बार चर्चा का केंद्र क्रॉस-बॉर्डर फाइनेंस और उसकी टेक्निकल बारीकियां होंगी। सदस्य देश किसी नई कॉमन करेंसी या अमेरिकी डॉलर को हटाने के बजाय, मौजूदा डोमेस्टिक पेमेंट सिस्टम और सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) के बीच तालमेल बिठाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर का एकीकरण

इस चर्चा का मुख्य उद्देश्य एक ऐसा फ्रेमवर्क तैयार करना है जिससे विभिन्न देशों के डिजिटल पेमेंट आर्किटेक्चर आपस में जुड़ सकें। भारत के लिए यह अपनी सफल UPI तकनीक का विस्तार करने का एक बड़ा मौका है। इसका लक्ष्य भारत, चीन, ब्राजील, सऊदी अरब और UAE जैसे देशों के बीच लोकल करेंसी में ट्रेड सेटलमेंट को तेज और किफायती बनाना है।

इन प्रणालियों को जोड़कर ब्लॉक का इरादा उन खर्चों को कम करना है, जो पारंपरिक बैंकिंग चैनलों के जरिए पैसा बदलने में लगते हैं। यह डॉलर को अंतरराष्ट्रीय वित्त से बाहर करने की कवायद नहीं, बल्कि द्विपक्षीय व्यापार के लिए सीधे और सस्ते रास्ते तलाशने की कोशिश है। भारत ने पहले ही UAE और रूस के साथ डिजिटल सेटलमेंट के ऐसे मॉडल टेस्ट किए हैं, जो क्लियरिंगहाउस की जरूरत को कम करते हैं।

व्यापारिक सुगमता और चुनौतियां

निवेशकों और व्यवसायों के लिए, यह कदम ऑपरेशनल एफिशिएंसी से जुड़ा है। वर्तमान में क्रॉस-बॉर्डर ट्रेड में ट्रांजैक्शन फीस और करेंसी कन्वर्जन का भारी बोझ होता है। इन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने से सप्लाई चेन की बाधाएं दूर हो सकती हैं। भारत ने साफ कर दिया है कि वह कॉमन करेंसी के विचार के बजाय मौजूदा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल को प्राथमिकता देगा।

हालांकि, इस पूरी योजना में तकनीकी और रेगुलेटरी जटिलताएं एक बड़ी चुनौती हैं। हर देश के अपने सुरक्षा मानक और डेटा प्राइवेसी कानून हैं, जिससे पूर्ण एकीकरण को हकीकत में बदलना एक लंबा सफर होगा। सितंबर की शुरुआत में वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक के गवर्नर्स की बैठक में ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि यह आर्किटेक्चर ग्लोबल ट्रेड पैटर्न को कितनी गहराई से प्रभावित कर पाएगा।

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