BCG India के मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल जैन ने भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बड़ी सलाह दी है। उनका कहना है कि अब समय आ गया है जब कंपनियों को हाई-वॉल्यूम इंपोर्ट को घरेलू उत्पादन से बदलना चाहिए। यह बदलाव न केवल आत्मनिर्भरता बढ़ाएगा, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स और इंडस्ट्रियल मशीनरी सेक्टर के निवेशकों के लिए नए मौके भी पैदा करेगा।
एक्सपोर्ट से आगे की सोच
BCG India के मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल जैन का मानना है कि भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सिर्फ ग्लोबल एक्सपोर्ट मार्केट पर निर्भर रहने के बजाय 'इंपोर्ट सब्स्टिट्यूशन' यानी विदेशी सामानों की जगह घरेलू उत्पाद बनाने पर ज्यादा फोकस करना चाहिए। इस रणनीति से भारत एक मजबूत मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभर सकता है, बशर्ते हम अपने संसाधनों का सही इस्तेमाल करें।
ट्रेड डेफिसिट और PLI स्कीम्स की भूमिका
भारत का ट्रेड डेफिसिट लंबे समय से एक चुनौती रहा है, जिसका बड़ा कारण इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और स्पेशलिटी केमिकल्स का भारी इंपोर्ट है। सरकार पहले ही Production Linked Incentive (PLI) स्कीम्स के जरिए कंपनियों को स्थानीय स्तर पर यूनिट्स लगाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इससे न केवल मार्जिन सुधर सकता है, बल्कि ग्लोबल सप्लाई चेन में होने वाले झटकों का असर भी कम होगा।
इनोवेशन है सबसे बड़ी चुनौती
इंपोर्ट सब्स्टिट्यूशन सिर्फ असेंबलिंग तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सफलता के लिए कंपनियों को R&D और टेक्नोलॉजी में बड़ा निवेश करना होगा। ऐतिहासिक रूप से भारतीय कंपनियां तकनीकी क्षमता और स्केल के मामले में पीछे रही हैं, जिसे बदलने के लिए अब भारी CAPEX की जरूरत है। अगर कंपनियां सिर्फ री-लेबलिंग पर जोर देंगी, तो वे ग्लोबल दिग्गजों के सामने टिक नहीं पाएंगी।
निवेशकों के लिए जरूरी चेकलिस्ट
जो निवेशक इस सेक्टर पर नजर रख रहे हैं, उन्हें ये 3 चीजें देखनी चाहिए:
- CAPEX प्लान: कंपनी इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए कितना निवेश कर रही है?
- वैल्यू-एडिशन: क्या कंपनी वास्तव में कंपोनेंट्स बना रही है या सिर्फ इंपोर्टेड सामान बेच रही है?
- एक्जीक्यूशन रिस्क: क्या कंपनी क्वालिटी और कीमत के मामले में इंपोर्टेड माल को टक्कर दे पा रही है?
याद रखें, सरकारी सपोर्ट के भरोसे से ज्यादा कंपनी की अपनी कॉम्पिटिटिवनेस लंबी दौड़ की रेस में मायने रखेगी।
