सोमवार को एशियाई शेयर बाजारों, जिसमें निक्केई और कोस्पी शामिल हैं, में तेजी देखी गई। यह अमेरिकी रोज़गार रिपोर्ट के बाद हुआ, जिसमें उम्मीद से ज़्यादा **23,000** नौकरियां घटी हैं। इससे फेडरल रिज़र्व पर सितंबर में ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव कम हो गया है। हालांकि, खाड़ी क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव के कारण बढ़ते तेल की कीमतें निवेशकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं, खासकर बुधवार को आने वाले अहम अमेरिकी महंगाई डेटा से पहले।
एशियाई बाजारों में क्यों आई तेजी?
सप्ताह की शुरुआत में एशिया के शेयर बाज़ारों में अच्छी रौनक देखने को मिली। जापान और दक्षिण कोरिया के प्रमुख सूचकांकों में बढ़त दर्ज की गई। इस तेजी का मुख्य कारण अमेरिका का जुलाई महीने का रोज़गार आंकड़ा रहा, जो विश्लेषकों की उम्मीदों से काफी कमज़ोर रहा। जहाँ 80,000 नई नौकरियां आने का अनुमान था, वहीं अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 23,000 नॉन-फार्म पेरोल की गिरावट देखी गई।
फेडरल रिज़र्व पर कम हुआ दबाव?
रोज़गार बाज़ार में यह नरमी निवेशकों के लिए अहम है क्योंकि यह अमेरिकी सेंट्रल बैंक, फेडरल रिज़र्व, की ब्याज दरें बढ़ाने की रणनीति को प्रभावित कर सकती है। एक ठंडा पड़ता लेबर मार्केट आमतौर पर महंगाई को काबू में करने के लिए इस्तेमाल होने वाली ब्याज दरों में बढ़ोतरी के तत्काल दबाव को कम करता है। इस डेटा के आने के बाद, सितंबर में दरें बढ़ने की संभावना बाज़ार में लगभग 44% रह गई है। आम तौर पर, कम ब्याज दर की उम्मीदें शेयरों के लिए एक सकारात्मक संकेत मानी जाती हैं, जो एशियाई इक्विटी बाज़ारों में शुरुआती उछाल की वजह है।
कच्चे तेल में उबाल, पर क्यों?
जहां एक ओर शेयर बाज़ारों में तेज़ी दिखी, वहीं एनर्जी सेक्टर में कीमतों का दबाव ऊपर की ओर रहा। ब्रेंट क्रूड की कीमतें लगभग $84.32 प्रति बैरल तक चढ़ गईं, और अमेरिकी क्रूड $78.74 पर पहुँच गया। इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण खाड़ी क्षेत्र में चल रहा भू-राजनीतिक तनाव है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग मार्गों को लेकर। बढ़ते तेल की कीमतें निवेशकों के लिए एक जटिल स्थिति पैदा करती हैं। जहाँ एक तरफ ये तेल उत्पादक कंपनियों के लिए फायदेमंद हो सकती हैं, वहीं दूसरी तरफ ये महंगाई को बढ़ा सकती हैं, जिससे व्यवसायों और आम लोगों के लिए लागत बढ़ जाती है।
आगे क्या?
अब सभी की निगाहें बुधवार को आने वाले अमेरिकी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) यानी महंगाई के आंकड़ों पर टिकी हैं। यह डेटा यह समझने के लिए महत्वपूर्ण होगा कि क्या लेबर मार्केट में नरमी का असर कीमतों पर दिख रहा है। अगर महंगाई के आंकड़े उम्मीद से ज़्यादा आते हैं, तो मौजूदा बाज़ार की तेज़ी पर ब्रेक लग सकता है और ब्याज दरों में बढ़ोतरी को लेकर फिर से बहस तेज़ हो सकती है।
वैश्विक स्तर पर कंपनियों के नतीजों का सीजन भी लगभग समाप्त हो चुका है, जिसमें लगभग 90% S&P 500 कंपनियों ने अपने नतीजे पेश कर दिए हैं। डेटा के अनुसार, कुछ निवेश लाभों को छोड़कर, प्रति शेयर आय (EPS) में 30% की सालाना वृद्धि देखी गई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एक बड़ा थीम बना हुआ है, जिसमें AI-संबंधित शेयरों में 28% की औसत वृद्धि देखी गई, जो गैर-AI शेयरों में 12% की वृद्धि से काफी ज़्यादा है। हालांकि, विश्लेषक आगाह कर रहे हैं कि आने वाली तिमाहियों में वृद्धि की यह गति धीमी हो सकती है।
निवेशकों को आने वाले महंगाई के आंकड़ों पर नज़र रखनी चाहिए और खाड़ी क्षेत्र के भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर भी ध्यान देना चाहिए। ये कारक तय करेंगे कि मौजूदा इक्विटी रैली अपनी ताकत बनाए रखेगी या नहीं, या फिर लगातार महंगाई और अस्थिर ऊर्जा लागत के जोखिम से वैश्विक बाज़ार की भावना पर नया दबाव बनेगा।
