16th Finance Commission के चेयरमैन Arvind Panagariya ने एक नया तर्क दिया है। उनके मुताबिक, रुपये में कमजोरी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बूस्ट दे सकती है, क्योंकि इससे आयातित सामान महंगा हो जाता है।
रुपये की कमजोरी का नया पहलू
आमतौर पर करेंसी में गिरावट को आर्थिक चिंता के तौर पर देखा जाता है, लेकिन Arvind Panagariya का नजरिया इससे जुदा है। उनका मानना है कि जब रुपया कमजोर होता है, तो विदेशों से आने वाला तैयार माल (Finished Goods) महंगा हो जाता है। इससे घरेलू खरीदार और कंपनियां स्थानीय विकल्पों की ओर रुख करती हैं, जो भारत की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के लिए एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है।
ट्रेड पॉलिसी में बड़े बदलाव की जरूरत
Panagariya ने भारत की वर्तमान व्यापार नीतियों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने Quality Control Orders (QCOs) और एंटी-डंपिंग ड्यूटी जैसे टूल्स के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल पर चिंता जताई है। उनका मानना है कि इन सुरक्षात्मक उपायों ने भारतीय एक्सपोर्टर्स को ग्लोबल मार्केट में प्रतिस्पर्धा करने से रोक रखा है। वे चाहते हैं कि सरकार अब इन जटिल नियमों को सरल बनाए ताकि निर्यातकों को बढ़ावा मिल सके।
ग्लोबल कॉम्पिटिशन और इन्वेस्टमेंट
दुनिया के बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब जैसे China और Vietnam से मुकाबले के लिए, Panagariya ने Bilateral Investment Treaties को अपडेट करने की वकालत की है। चूंकि World Trade Organization का प्रभाव कम हो रहा है और बड़े देश सब्सिडी व टैरिफ का सहारा ले रहे हैं, ऐसे में भारत को एक स्थिर और आकर्षक पॉलिसी फ्रेमवर्क की जरूरत है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
शेयर बाजार के निवेशकों के लिए यह खबर काफी अहम है। यदि सरकार ट्रेड बैरियर्स को कम करती है, तो उन कंपनियों को सीधा फायदा होगा जो कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर हैं। वहीं, एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड कंपनियों के लिए भी रास्ता आसान हो सकता है। आने वाले समय में ट्रेड पॉलिसी और आयात नियमों में होने वाले बदलाव सीधे तौर पर कंपनियों के मार्जिन को प्रभावित करेंगे, जिस पर निवेशकों को पैनी नजर रखनी चाहिए।
