16th फाइनेंस कमीशन के चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया का मानना है कि भारत को रुपये की गिरती कीमतों को लेकर पुरानी सोच बदलनी चाहिए। उन्होंने इसे एक्सपोर्ट बढ़ाने के लिए एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की सलाह दी है, जिससे घरेलू मैन्युफैक्चरर्स को वैश्विक बाजार में मजबूती मिल सके।
रुपये को बचाने की कोशिशें पड़ सकती हैं भारी
अरविंद पनगढ़िया का तर्क है कि डॉलर के मुकाबले रुपये को हर स्तर पर बचाने की कोशिश करना सही रणनीति नहीं है। उनका मानना है कि ₹100 प्रति डॉलर जैसे मनोवैज्ञानिक स्तरों को डिफेंड करने के चक्कर में विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) का अनावश्यक खर्च होता है। उनके अनुसार, मुद्रा का अवमूल्यन (Depreciation) एक्सपोर्ट को सस्ता बनाता है और विदेशों में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ाता है। उन्होंने 1991 से 2002 के उस दौर का उदाहरण दिया, जब मुद्रा समायोजन के जरिए ही भारत में एक्सपोर्ट में बड़ा उछाल देखने को मिला था।
निवेशकों के लिए नफा-नुकसान का गणित
इस नीति का असर शेयर बाजार के अलग-अलग सेक्टरों पर अलग होगा:
- फायदा किसे होगा: IT, फार्मा और टेक्सटाइल जैसे सेक्टर, जिनकी कमाई डॉलर में होती है, उन्हें रुपये की कमजोरी से बेहतर मार्जिन मिल सकता है।
- नुकसान किसे होगा: कच्चा माल (Raw Material) आयात करने वाली कंपनियां, ऑयल सेक्टर और केमिकल कंपनियां, जिनकी लागत रुपये गिरने से बढ़ जाएगी।
सबसे बड़ा जोखिम उन कंपनियों के लिए है, जिन पर भारी डॉलर-डिनोमिनेटेड कर्ज है। रुपये में गिरावट के साथ उनका कर्ज चुकाने का बोझ बढ़ जाएगा, जिससे प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव पड़ेगा।
औद्योगिक सुधारों पर जोर
पनगढ़िया ने केवल करेंसी पर ही नहीं, बल्कि औद्योगिक दक्षता पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने 'क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स' (QCOs) और 'एंटी-डंपिंग ड्यूटी' के भारी उपयोग की आलोचना की है। उनका मानना है कि इन उपायों से घरेलू कंपनियां वैश्विक प्रतिस्पर्धा से कट जाती हैं और उनमें नवाचार (Innovation) की कमी आती है। निवेशकों के लिए अब Reserve Bank of India (RBI) की आने वाली करेंसी पॉलिसी और सरकारी व्यापार नियमों पर नजर रखना बेहद जरूरी हो गया है।
