गौतम अडानी ने क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों से इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को आंकने के तरीके पर दोबारा सोचने को कहा है। उनका तर्क है कि मौजूदा मॉडल 'इंटरकनेक्टेड प्लेटफॉर्म' की असली वैल्यू नहीं दिखा पाते हैं, जिससे भविष्य में निवेश के मायने बदल सकते हैं।
रेटिंग मॉडल में बदलाव की जरूरत
CareEdge Group के एनुअल समिट में बोलते हुए अडानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडानी ने कहा कि भारत के आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स अब अकेले खड़े एसेट नहीं रह गए हैं। पारंपरिक फाइनेंशियल मॉडल, जैसे कि डिस्काउंटेड कैश फ्लो, आज के दौर के इंटरकनेक्टेड प्रोजेक्ट्स की ताकत को पूरी तरह नहीं समझ पा रहे हैं।
'प्लेटफॉर्म इंफ्रास्ट्रक्चर' का कॉन्सेप्ट
अडानी ने 'मुंद्रा पोर्ट' (Mundra Port) और 'खावड़ा रिन्यूएबल एनर्जी साइट' (Khavda energy site) का उदाहरण देते हुए समझाया कि ये केवल प्रोजेक्ट्स नहीं बल्कि पूरे इकोसिस्टम हैं। ये हब अपने साथ लॉजिस्टिक्स, रेल नेटवर्क और इंडस्ट्रियल पार्कों को सहारा देते हैं, जिससे रिस्क कम होता है और कॉस्ट शेयरिंग बढ़ती है।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
रेटिंग सीधे कंपनी की कर्ज लेने की लागत (Cost of Capital) को प्रभावित करती है। अगर एजेंसियां इस नए 'प्लेटफॉर्म' नजरिए को अपनाती हैं, तो इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के प्रति बाजार का नजरिया बदल सकता है। हाल ही में, Adani Enterprises ने शेयर बाजार में शानदार प्रदर्शन किया है और इस साल अब तक शेयर 34% उछल चुका है। इसके अलावा, जुलाई 2026 में कंपनी ने QIP के जरिए ₹15,000 करोड़ जुटाकर बाजार में मजबूत पकड़ दिखाई है।
रेटिंग एजेंसियों के सामने चुनौती
हालांकि, यह राह आसान नहीं है। रेटिंग एजेंसियां आमतौर पर लिक्विडिटी और कैश-फ्लो जैसे कड़े मानकों पर भरोसा करती हैं। अडानी का मानना है कि उनका मकसद रेटिंग स्टैंडर्ड को कम करना नहीं, बल्कि मूल्यांकन के लिए 'वाइडर लेंस' का इस्तेमाल करना है। देखना यह होगा कि क्या एजेंसियां इन नए और थोड़े अमूर्त (intangible) मापदंडों को अपनी रिपोर्ट में जगह देती हैं या नहीं।
