ASSOCHAM के अध्यक्ष निर्मल कुमार मिंडा ने सरकार से हाई-टेक इम्पोर्ट्स पर BIS सर्टिफिकेशन में अंधाधुंध छूट न देने की अपील की है। मैन्युफैक्चरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर के निवेशकों को अब सरकारी नीतियों पर कड़ी नजर रखनी होगी।
क्या है पूरा मामला?
Bureau of Indian Standards (BIS) सर्टिफिकेशन इन दिनों औद्योगिक नीति के केंद्र में है। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के नेतृत्व में सरकार सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे हाई-टेक सेक्टर में निवेश को बढ़ावा देने के लिए एक नए फ्रेमवर्क पर विचार कर रही है। सरकार का मकसद ग्लोबल सप्लाई चेन में आ रही बाधाओं को दूर करना है ताकि उत्पादन में तेजी आए।
उद्योग जगत की चिंताएं
हालांकि, ASSOCHAM के अध्यक्ष निर्मल कुमार मिंडा का मानना है कि 'ब्लैंकेट छूट' (Blanket exemptions) कंपनी के लिए उल्टा असर डाल सकती है। उद्योग मंडल का तर्क है कि इससे क्वालिटी बेंचमार्क में कमी आएगी और घरेलू मैन्युफैक्चरर्स को वैश्विक स्तर पर कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। यह कदम 'मेक इन इंडिया' के उन लक्ष्यों को भी कमजोर कर सकता है, जिनका उद्देश्य भारत को एक हाई-क्वालिटी मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
ASSOCHAM ने सुझाव दिया है कि सरकार को पूरी तरह छूट देने के बजाय 'टारगेटेड फ्रेमवर्क' अपनाना चाहिए। निवेशकों के लिए यह एक महत्वपूर्ण मॉनिटरेबल है। यदि नियमों में ढील दी जाती है, तो उन कंपनियों पर असर पड़ सकता है जो पूरी तरह से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग पर निर्भर हैं। उन्हें आयातित सामानों से सस्ती प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उनके मार्जिन पर दबाव आने की आशंका है।
आने वाले समय में वाणिज्य मंत्रालय की ओर से आने वाले नोटिफिकेशन पर नजर रखना अनिवार्य होगा। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार किस तरह की छूट देती है और क्वालिटी पर क्या नियंत्रण बनाए रखती है, क्योंकि यही भविष्य में भारतीय मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी और मार्केट शेयर तय करेगा।
