International Energy Agency (IEA) की नई रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण-पूर्व एशिया (Southeast Asia) में बिजली की मांग **2030** तक हर साल **5.4%** की दर से बढ़ेगी। भू-राजनीतिक (Geopolitical) जोखिमों के चलते अब ये देश फिर से कोयले की ओर रुख कर रहे हैं, जो औद्योगिक लागत को बढ़ा सकता है।
कोयले की ओर वापसी का कारण
IEA के प्रोजेक्शन के मुताबिक, तेजी से बढ़ते औद्योगिक विकास, डेटा सेंटर्स के विस्तार और बढ़ती गर्मी के चलते बिजली की खपत में भारी उछाल आने वाला है। इसे पूरा करने के लिए इस क्षेत्र में कोयले की मांग 4.4% सालाना बढ़ने की उम्मीद है, जिससे यह दुनिया के सबसे तेजी से कोयला खपत करने वाले क्षेत्रों में से एक बन गया है। यह बदलाव लॉन्ग-टर्म पसंद नहीं, बल्कि 'एनर्जी सिक्योरिटी' की मजबूरी है। 2026 में 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) में आए संकट के दौरान Liquefied Natural Gas (LNG) की सप्लाई प्रभावित हुई थी, जिसके बाद सरकारों ने बिजली की स्थिरता के लिए पुराने कोयला संयंत्रों को फिर से चालू कर दिया है।
ग्लोबल सप्लाई चेन पर असर
इस जीवाश्म ईंधन (Fossil fuel) पर निर्भरता का असर सिर्फ बिजली के बिलों तक सीमित नहीं है। उदाहरण के तौर पर, इंडोनेशिया का निकेल प्रोसेसिंग उद्योग भारी मात्रा में बिजली और सल्फर जैसे कच्चे माल पर निर्भर है। यदि ऊर्जा की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण मिनरल्स की लागत पर पड़ेगा।
निवेशकों के लिए चुनौती यह है कि इन देशों का आर्थिक विकास तो तेज है, लेकिन इसे सहारा देने वाला ऊर्जा बुनियादी ढांचा (Infrastructure) अभी तैयार नहीं है। अब देखना यह होगा कि ये देश कब तक रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से विकसित कर पाते हैं। यदि एनर्जी मिक्स में विविधता नहीं आई, तो बढ़ते फ्यूल सब्सिडी बिल और टैरिफ में अचानक बदलाव का सीधा असर ऊर्जा-गहन उद्योगों के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ सकता है।
