All India Notebook Manufacturers Association (AINMA) ने Commerce Ministry से नोटबुक्स के इंपोर्ट पर Minimum Import Price (MIP) तय करने की मांग की है। साल 2026 की पहली छमाही में नोटबुक्स का इंपोर्ट **5 गुना** बढ़ गया है, जिससे घरेलू मैन्युफैक्चरर्स के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है।
इंपोर्ट में भारी उछाल का असर
आंकड़े बताते हैं कि घरेलू निर्माताओं पर दबाव तेजी से बढ़ रहा है। साल 2026 की पहली छमाही में भारत ने ₹22.36 करोड़ की नोटबुक्स इंपोर्ट की हैं, जो पिछले साल की इसी अवधि में महज ₹3.65 करोड़ थी। इस उछाल के पीछे 2010 में हुआ India-ASEAN Free Trade Agreement मुख्य कारण है, जिसके तहत नोटबुक्स पर कोई कस्टम ड्यूटी नहीं लगती है।
टैक्स का दोहरा मार
स्थानीय मैन्युफैक्चरर्स 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' की समस्या से जूझ रहे हैं। जहाँ एक तरफ कच्चे माल (raw materials) पर भारी टैक्स देना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर तैयार नोटबुक्स बिना किसी टैक्स के देश में आ रही हैं। इतना ही नहीं, GST नियमों के कारण भी घरेलू उत्पादकों को इनपुट टैक्स क्रेडिट का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है, जिससे वे कीमतों के मामले में विदेशी माल से पिछड़ रहे हैं।
1500 छोटी यूनिट्स पर संकट
एसोसिएशन ने साफ तौर पर चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने जल्द ही प्राइस फ्लोर (Minimum Import Price) तय नहीं किया, तो देशभर में फैली 1,500 से ज्यादा माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) बंद होने की कगार पर आ सकती हैं। ये छोटी इकाइयां ही घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रीढ़ हैं। अब निवेशकों की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या कॉमर्स मिनिस्ट्री इस मांग को मानकर घरेलू निर्माताओं को राहत देगी या नहीं।
