All India Food Processors Association (AIFPA) ने सरकार के उस प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसके तहत पैक्ड फूड्स पर लाल रंग का षट्कोणीय (hexagonal) वार्निंग लेबल लगाना अनिवार्य किया जा रहा है।
इस मामले में मुख्य विवाद 'लाल रंग' को लेकर है। इंडस्ट्री बॉडी का तर्क है कि भारतीय ग्राहक लाल रंग को पहले से ही मांसाहारी उत्पादों के पहचान चिह्न के तौर पर देखते हैं। ऐसे में अगर हाई शुगर, साल्ट या फैट (HFSS) वाले उत्पादों पर लाल लेबल लगा, तो ग्राहकों के बीच भारी कन्फ्यूजन पैदा हो सकता है। यह न सिर्फ ब्रांड की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है, बल्कि पोषण की जानकारी को लेकर भी गलतफहमी पैदा करेगा।
निवेशकों के लिए क्या है जोखिम?
अगर सरकार का यह फैसला लागू होता है, तो FMCG सेक्टर की कंपनियों को बड़े पैमाने पर अपने उत्पाद की पैकेजिंग डिजाइन बदलनी पड़ सकती है। इससे कंपनियों की ऑपरेशनल कॉस्ट में अचानक उछाल आएगा।
- री-पैकेजिंग खर्च: सभी उत्पादों के डिजाइन बदलने से शॉर्ट टर्म में मुनाफे पर असर पड़ सकता है।
- डिमांड में बदलाव: यदि पैकेट पर स्वास्थ्य चेतावनी साफ दिखेगी, तो ग्राहक अनहेल्दी उत्पादों से दूरी बना सकते हैं, जिससे डिमांड पर असर पड़ सकता है।
भविष्य की राह
रेगुलेटर्स का कहना है कि मोटापा और डायबिटीज जैसी बीमारियों को रोकने के लिए ऐसे कड़े कदम जरूरी हैं। वहीं, फूड इंडस्ट्री बेहतर और सूक्ष्म पोषण संबंधी खुलासों की मांग कर रही है, जो रंग-आधारित चेतावनी पर निर्भर न हो। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इस सेक्टर के लिए मील का पत्थर साबित होगी, क्योंकि यह फैसला भविष्य में पोषण संबंधी खुलासों (Nutrition Disclosures) के मानकों को तय करेगा। आने वाले समय में कंपनियां अपने पोर्टफोलियो में सॉल्ट और शुगर कम करने के लिए मजबूर हो सकती हैं, जिससे आने वाले समय में प्रोडक्ट का फॉर्मूलेशन भी बदल सकता है।
