AI का असर: भारत में बदल रहा है हायरिंग मॉडल, क्या अब डिग्री की वैल्यू घटेगी?

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AuthorNeha Patil|Published at:
AI का असर: भारत में बदल रहा है हायरिंग मॉडल, क्या अब डिग्री की वैल्यू घटेगी?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की वजह से भारत के जॉब मार्केट में बड़ा बदलाव आ रहा है। कंपनियां अब फ्रेशर्स की भारी भर्ती करने के बजाय एक्सपर्ट्स की तलाश में हैं, जिससे विश्वविद्यालयों के सामने अपना सिलेबस बदलने का भारी दबाव बन गया है।

कॉर्पोरेट जगत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का असर अब सीधे तौर पर दिखने लगा है। पिछले कई दशकों से कंपनियां 'पिरामिड मॉडल' का पालन करती थीं, जहां बड़ी संख्या में फ्रेशर्स को एंट्री-लेवल या प्रशासनिक कामों के लिए रखा जाता था। लेकिन अब यह ढांचा बदलकर 'डायमंड शेप' का हो रहा है। कंपनियां अब कम लोगों को रख रही हैं, लेकिन उन्हें ऐसे टैलेंट की जरूरत है जो AI-ड्रिवन वर्कफ़्लो को संभाल सकें।

कॉर्पोरेट जगत की बदली जरूरतें

कंपनियां अब उन प्रोफेशनल्स पर ज्यादा पैसा खर्च कर रही हैं जो डेटा को प्रोसेस कर सकें और जटिल समस्याओं का समाधान निकाल सकें। इसका सीधा असर डिग्री की अहमियत पर पड़ा है। यदि विश्वविद्यालय केवल किताबी ज्ञान देते रहे और प्रैक्टिकल AI स्किल्स पर फोकस नहीं किया, तो ग्रेजुएट्स की एम्प्लॉयबिलिटी पर बड़ा खतरा मंडरा सकता है।

शिक्षा प्रणाली के सामने चुनौतियां

भारतीय उच्च शिक्षण संस्थान अभी भी पुरानी पद्धतियों में उलझे हुए हैं। कई कॉलेज सिर्फ डिग्री की संख्या बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं, न कि लर्निंग की क्वालिटी पर। वक्त की मांग है कि संस्थान 'डिग्री फैक्ट्री' बनने के बजाय ऐसी जगह बनें जहां इंजीनियरिंग के साथ-साथ एथिक्स, इकोनॉमिक्स और डेटा साइंस की पढ़ाई एक साथ हो सके।

नियामक और अन्य बाधाएं

नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 और इंडिया AI मिशन जैसे सरकारी प्रयास तो हो रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका क्रियान्वयन सुस्त है। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) और ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) जैसे संस्थानों को अब केवल नियम बनाने के बजाय एकेडमिक इनोवेशन को बढ़ावा देने की जरूरत है।

भविष्य का रिस्क: डिजिटल डिवाइड

इस बदलाव में सबसे बड़ा जोखिम 'डिजिटल डिवाइड' का है। अगर केवल टॉप संस्थानों को ही AI रिसोर्सेज मिले और छोटे कॉलेजों के छात्र पीछे छूट गए, तो भारत का लेबर मार्केट दो हिस्सों में बंट जाएगा। निवेशकों और पॉलिसी मेकर्स के लिए यह देखना जरूरी है कि यूनिवर्सिटीज कितनी तेजी से अपने करिकुलम को स्किल-बेस्ड बना रही हैं, क्योंकि इसी पर भारत के ह्यूमन कैपिटल का भविष्य टिका है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.