AI की सुनामी एशिया के व्यापारिक संतुलन को पूरी तरह बदल रही है। चिप एक्सपोर्ट करने वाले उत्तर एशियाई देश मालामाल हो रहे हैं, जबकि डेटा सेंटर बनाने वाले दक्षिण एशियाई देशों पर आयात का भारी दबाव बढ़ रहा है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की ग्लोबल सप्लाई चेन में एंट्री ने एशियाई देशों के आर्थिक प्रदर्शन को दो स्पष्ट ध्रुवों में बांट दिया है। अक्टूबर 2026 तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो जो देश AI के लिए जरूरी तकनीक का निर्माण कर रहे हैं, वे भारी मुनाफा कमा रहे हैं। वहीं, जो देश सिर्फ डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहे हैं, उन पर आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है।
नॉर्थ एशिया: चिप से हो रही है कमाई
ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे देश AI चिप्स और सर्वर सप्लाई करने वाले मुख्य केंद्र बन गए हैं। इनकी डिमांड इतनी ज्यादा है कि जुलाई 2026 तक इनका कुल करंट अकाउंट सरप्लस रिकॉर्ड $538 बिलियन के स्तर पर पहुंच गया है। यह एक्सपोर्ट-आधारित विकास इन देशों के लिए एक मजबूत आर्थिक ढाल का काम कर रहा है।
साउथ-ईस्ट एशिया: इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी लागत
दूसरी तरफ, थाईलैंड, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देश डेटा सेंटर हब बनने की होड़ में हैं। साल 2026 की पहली छमाही तक इन देशों में हाइपरस्केलर्स ने $160 बिलियन से ज्यादा का निवेश किया है। समस्या यह है कि इन प्रोजेक्ट्स के लिए जरूरी हार्डवेयर का आयात करने के कारण इन देशों का ट्रेड डेफिसिट लगातार चौड़ा होता जा रहा है।
बढ़ते जोखिम और चुनौतियां
ASEAN+3 मैक्रोइकॉनॉमिक रिसर्च ऑफिस (AMRO) ने चेतावनी दी है कि यह स्थिति जोखिम भरी हो सकती है। अगर ग्लोबल लेवल पर AI इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग में कमी आती है, तो दक्षिण एशियाई देशों में आया पूंजी का बहाव उल्टा हो सकता है, जिससे वित्तीय अस्थिरता पैदा होगी। इसके अलावा, बिजली और पानी जैसे संसाधनों की सीमित उपलब्धता इन प्रोजेक्ट्स की लॉन्ग-टर्म सफलता पर सवाल उठा रही है। निवेशकों के लिए आने वाली तिमाहियों में यह देखना अहम होगा कि ये देश अपने बढ़ते कर्ज और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरतों के बीच कैसे तालमेल बैठाते हैं।
