साल 2026 में औसत सैलरी हाइक **9%** तक पहुंची है, लेकिन खाने-पीने और ईंधन की बढ़ती महंगाई ने आम आदमी की क्रय शक्ति (Purchasing Power) को खत्म कर दिया है। निवेशकों को कंज्यूमर स्पेंडिंग और रिटेल लोन डिफॉल्ट के बढ़ते आंकड़ों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
भारत में साल 2026 में कॉरपोरेट सैलरी में औसतन 9% की वृद्धि हुई है, लेकिन बढ़ती महंगाई के आगे यह बढ़ोतरी नाकाफी साबित हो रही है। इस डिस्कनेक्ट का सीधा असर उन सेक्टरों पर पड़ रहा है जो कंज्यूमर डिमांड पर निर्भर हैं।
महंगाई का गणित
सितंबर में खुदरा महंगाई दर 5.54% रही, जिसमें खाने-पीने की चीजों का बड़ा हाथ है। फूड इन्फ्लेशन 7.74% के स्तर पर है। प्याज जैसी जरूरी रसोई की चीजों के दाम 108% सालाना आधार पर बढ़े हैं। ऐसे में सैलरी में हुई बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा घर के बेसिक खर्चों में ही खर्च हो रहा है, जिससे लग्जरी और नॉन-एसेंशियल खर्चों के लिए जगह कम बची है।
कंपनियों के मार्जिन पर दबाव
होलसेल इन्फ्लेशन फिलहाल 11.39% पर है। इसका मतलब है कि कंपनियों पर इनपुट कॉस्ट का जबरदस्त दबाव है। कंपनियां या तो इन बढ़ी हुई कीमतों को ग्राहकों पर डाल रही हैं जिससे डिमांड घट रही है, या फिर खुद झेल रही हैं जिससे उनके मार्जिन पर असर पड़ रहा है। आने वाले तिमाही नतीजों में कंपनियों की वॉल्यूम ग्रोथ धीमी हो सकती है।
कर्ज का जाल और बढ़ता डिफॉल्ट
बैंकिंग सेक्टर के लिए चिंता की बात यह है कि हाउसिंग को छोड़कर अन्य रिटेल लोन कुल कर्ज का 58% हिस्सा बन चुके हैं। छोटे टिकट वाले लोन (small-ticket loans) में डेलिंक्वेंसी रेट (delinquency rate) बढ़कर 6.4% हो गया है। यह साफ इशारा है कि आम आदमी के लिए कर्ज चुकाना मुश्किल होता जा रहा है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को अब इन तीन चीजों पर नजर रखनी चाहिए:
- FMCG कंपनियों में 'डाउनट्रेडिंग': लोग छोटे पैक साइज या सस्ते विकल्पों की ओर शिफ्ट हो रहे हैं या नहीं।
- लोन बुक क्वालिटी: बैंकों और NBFC के पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड पोर्टफोलियो की एसेट क्वालिटी कैसी है।
- RBI का रुख: यदि महंगाई कम नहीं हुई, तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ब्याज दरों को ऊंचा रख सकता है, जिससे कॉर्पोरेट विस्तार और आम आदमी की अफोर्डेबिलिटी दोनों प्रभावित होंगी।
