Great Lakes Institute of Management की एक नई स्टडी के मुताबिक, भारत का करीब 25% वर्कफोर्स AI की चपेट में है। इसमें 11.4% कर्मचारियों के सामने नौकरी जाने का बड़ा रिस्क है।
एआई (AI) का जॉब मार्केट पर क्या असर?
Great Lakes Institute of Management के सेंटर फॉर फाइनेंस एंड इकोनॉमिक रिसर्च की नई रिपोर्ट ने भारतीय जॉब मार्केट को लेकर चिंता बढ़ा दी है। पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के आंकड़ों के आधार पर यह पाया गया है कि देश का 25% वर्कफोर्स आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी चुनौतियों के दायरे में है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 7.6% कर्मचारी ऐसे हैं जिन्हें AI से फायदा हो सकता है और उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ सकती है। लेकिन, 11.4% कर्मचारी ऐसे हैं जिनकी नौकरी पर सीधा खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि उनका काम रूटीन वाला है जिसे AI आसानी से रिप्लेस कर सकता है।
युवा सबसे ज्यादा असुरक्षित
इस बदलाव का सबसे बुरा असर युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है। 15-24 साल की उम्र के युवाओं में से 39.4% लोग ऐसी भूमिकाओं में हैं जहां AI के कारण काम छिनने का जोखिम सबसे अधिक है। इस एज ग्रुप में रूटीन नौकरियों और कॉम्प्लीमेंट्री रोल का अनुपात 7.6:1 है, जो बड़ी उम्र के लोगों के मुकाबले काफी खराब है। इसका मतलब है कि एंट्री-लेवल जॉब्स पर सबसे पहले गाज गिर सकती है।
कौन से सेक्टर सुरक्षित हैं?
राहत की बात यह है कि कृषि और स्किल्ड ट्रेड्स जैसे सेक्टर, जो देश की 54% वर्किंग पापुलेशन को रोजगार देते हैं, फिलहाल AI के प्रभाव से सुरक्षित हैं। यहाँ शारीरिक मेहनत और नॉन-रूटीन काम की जरूरत होती है, जिसे फिलहाल मशीनें नहीं दोहरा सकतीं।
आगे की राह क्या है?
रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र, हरियाणा, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में AI से जुड़ी सकारात्मक भूमिकाएं अधिक हैं, जो भविष्य के लिए एक मॉडल बन सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अब 'री-स्किलिंग' (Reskilling) ही एकमात्र रास्ता है। क्रिटिकल थिंकिंग, जजमेंट और क्लाइंट एंगेजमेंट जैसे स्किल्स को अपनाकर ही कर्मचारी इस तकनीकी बदलाव में खुद को प्रासंगिक बनाए रख सकते हैं।
