US में 25 राज्यों का नया कदम: भारत सहित 60 देशों के एक्सपोर्ट पर लगे टैरिफ को चुनौती

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AuthorAditya Rao|Published at:
US में 25 राज्यों का नया कदम: भारत सहित 60 देशों के एक्सपोर्ट पर लगे टैरिफ को चुनौती

अमेरिका के 25 राज्यों के एक समूह ने ट्रंप प्रशासन के हालिया फैसले को अदालत में चुनौती दी है। इस फैसले के तहत भारत समेत 60 देशों से आयात होने वाले सामानों पर नए टैरिफ (Tariffs) लगाए गए हैं। राज्यों का कहना है कि प्रशासन जबरन श्रम (Forced Labor) के बहाने बड़े पैमाने पर आयात शुल्क लगाकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन कर रहा है। भारतीय निर्यातकों (Exporters) के लिए यह स्थिति ड्यूटी रेट्स को लेकर अनिश्चितता बढ़ा रही है, जो हाल ही में कुछ सामानों के लिए **10%** तक समायोजित किए गए थे।

व्यापारिक अधिकारों पर कानूनी जंग

अमेरिका के 25 राज्यों ने आयात शुल्क (Import Duties) के नए दौर को औपचारिक रूप से चुनौती दी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों के लिए एक नई कानूनी बाधा खड़ी हो गई है। यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड (US Court of International Trade) में दायर इस मुकदमे का निशाना 24 जुलाई को घोषित वे टैरिफ हैं जो 60 देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, को प्रभावित करते हैं। राज्यों का तर्क है कि संघीय सरकार उन आयात शुल्कों को सही ठहराने के लिए जबरन श्रम का इस्तेमाल कर रही है, जिन्हें पहले अदालतों ने रोक दिया था, और इस तरह वह पिछले अदालती फैसलों को दरकिनार करने की कोशिश कर रही है।

इस मुकदमे का मुख्य मुद्दा यह है कि क्या प्रशासन के पास ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 (Section 301 of the Trade Act of 1974) के तहत इन व्यापक शुल्कों को लगाने का कानूनी अधिकार है। ऐतिहासिक रूप से, इस धारा का उपयोग विशिष्ट अनुचित व्यापार प्रथाओं को संबोधित करने के लिए किया जाता रहा है, जिसमें अक्सर व्यक्तिगत देशों को निशाना बनाया जाता था। राज्यों का दावा है कि इतने बड़े पैमाने पर इन उपायों को लागू करना कार्यकारी अधिकार का दुरुपयोग है। ओरेगॉन के अटॉर्नी जनरल, डैन रेफील्ड, जिन्होंने इस चुनौती का नेतृत्व किया है, ने प्रशासन के कार्यों को उन नीतियों को फिर से लागू करने का प्रयास बताया है जिन्हें अदालतों ने पहले ही खारिज कर दिया है।

भारतीय व्यापार पर असर और छूट

भारतीय उद्योगों के लिए स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। 24 जुलाई की घोषणा के बाद, भारतीय सामानों पर लागू टैरिफ दर को पहले प्रस्तावित 12.5% से घटाकर 10% कर दिया गया था। हालाँकि, यह कानूनी चुनौती इस बारे में महत्वपूर्ण अनिश्चितता पैदा करती है कि क्या ये दरें बनी रहेंगी या इनमें और बदलाव होंगे। कुछ श्रेणियों, जैसे कच्चा तेल (Crude Oil), प्राकृतिक गैस (Natural Gas), और उर्वरक (Fertilizers), को छूट दी गई थी, साथ ही यूएस-मेक्सिको-कनाडा व्यापार समझौते (US-Mexico-Canada trade agreement) के तहत आने वाले उत्पादों को भी। यह ऊर्जा और कृषि आयात के लिए कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन विनिर्माण (Manufacturing) और अन्य क्षेत्रों को अदालत के फैसले के परिणामों के प्रति संवेदनशील बनाता है।

व्यापारिक लड़ाइयों का ऐतिहासिक संदर्भ

यह मुकदमा प्रशासन के संरक्षणवादी आर्थिक एजेंडे और अमेरिकी न्यायिक प्रणाली के बीच चल रहे संघर्षों की नवीनतम कड़ी है। शुरुआती कानूनी झटकों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ब्रॉड टैरिफ लागू करने के लिए इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (International Emergency Economic Powers Act) के उपयोग को सीमित करना शामिल था। इसके अलावा, ट्रेड एक्ट की धारा 122 (Section 122 of the Trade Act) का उपयोग करके वैश्विक टैरिफ लागू करने के प्रयासों को भी कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा और यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड ने उन्हें अवैध घोषित कर दिया था, हालाँकि वे अपील प्रक्रिया के दौरान लागू रहे। निवेशक और भारतीय निर्यातक अदालत के अगले कदमों पर बारीकी से नजर रखेंगे, क्योंकि कोई भी फैसला या तो प्रशासन की मौजूदा टैरिफ संरचना को बनाए रख सकता है या उसे पीछे हटने पर मजबूर कर सकता है, जिसका सीधा असर अमेरिकी बाजार में प्रवेश करने वाले भारतीय सामानों की लागत और प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.