2026 में होने वाले US मिड-टर्म चुनाव अमेरिकी कांग्रेस की शक्ति का संतुलन तय करेंगे, जिसका सीधा असर भारत की ट्रेड पॉलिसी और बाजार की चाल पर पड़ सकता है।
2026 में होने वाले अमेरिकी मिड-टर्म चुनाव ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट के लिए सबसे बड़ा 'वॉच-लिस्ट' इवेंट साबित हो सकते हैं। हालांकि यह चुनाव अमेरिका की घरेलू प्रक्रिया है, लेकिन अमेरिकी कांग्रेस में सत्ता का बदलाव वहां के राष्ट्रपति की कानून बनाने, बजट पास करने और ट्रेड पॉलिसी तय करने की क्षमता को पूरी तरह बदल सकता है।\n\n### मार्केट में डर का मुख्य कारण: लेजिस्लेटिव ग्रिडलॉक\n\nनिवेशकों की नजर इस बात पर है कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति की पार्टी कांग्रेस पर अपनी पकड़ बनाए रख पाएगी। अगर ऐसा नहीं होता है, तो अमेरिका में 'पॉलिसी पैरालिसिस' की स्थिति बन सकती है। इतिहास गवाह है कि जब वहां सरकार टैक्स रिफॉर्म्स या फेडरल खर्चों को लेकर उलझती है, तो डॉलर इंडेक्स (US Dollar Index) और ट्रेजरी यील्ड में जबरदस्त उछाल-पछाड़ देखने को मिलती है। इसका सीधा असर इमर्जिंग मार्केट जैसे भारत पर पड़ता है।\n\n### FII फ्लो और रुपये की चाल\n\nभारत के लिए सबसे बड़ा रिस्क FII (Foreign Institutional Investor) फंड फ्लो का है। जब भी अमेरिका में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है, ग्लोबल निवेशक सुरक्षित निवेश की ओर भागते हैं, जिससे भारतीय शेयरों से पैसा निकलने का डर बना रहता है। साथ ही, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की पॉलिसी और डॉलर की मजबूती के कारण भारतीय रुपया भी दबाव में आ सकता है।\n\n### इन सेक्टरों पर होगी पैनी नजर\n\nभारतीय आईटी (IT) और फार्मा (Pharmaceutical) सेक्टर पूरी तरह से अमेरिकी नीतियों पर निर्भर हैं। वहां की इमीग्रेशन पॉलिसी, कॉर्पोरेट टैक्स और हेल्थकेयर बजट में कोई भी बदलाव इन कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर सकता है। वहीं, अगर अमेरिका की एनर्जी पॉलिसी बदलती है, तो ग्लोबल कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में उतार-चढ़ाव भारत के ऑयल इंपोर्ट बिल और करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) को बिगाड़ सकता है।\n\nअंत में, चुनाव के नतीजों में देरी होने पर भी बाजार में अस्थिरता (Volatility) बढ़ सकती है, इसलिए निवेशकों को नई कांग्रेस के एजेंडे पर नजर रखनी चाहिए, जो आने वाले सालों में भारत-अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों की दिशा तय करेगा।
