2026 के अर्थशास्त्र के नोबेल विजेताओं रॉबर्ट हॉल और माइकल वुडफोर्ड की थ्योरी भारत की इंफ्लेशन-टारगेटिंग नीति का आधार है। लेकिन इथेनॉल मैंडेट जैसी सप्लाई-साइड चुनौतियां अब RBI के लिए नई मुसीबत खड़ी कर रही हैं।
नोबेल थ्योरी और RBI का कनेक्शन
वर्ष 2026 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार रॉबर्ट हॉल और माइकल वुडफोर्ड को दिया गया है। इनकी रिसर्च ने दुनियाभर के सेंट्रल बैंकों को एक नया रास्ता दिखाया है। भारत में 2016 में जो फ्लेक्सिबल इंफ्लेशन-टारगेटिंग और Monetary Policy Committee (MPC) का ढांचा तैयार किया गया, वह इन्हीं की थ्योरी पर आधारित है। हॉल-वुडफोर्ड मॉडल का मुख्य मंत्र है—इंटरेस्ट रेट के जरिए भविष्य की महंगाई की उम्मीदों को काबू करना।
नई मुसीबत: सप्लाई-साइड का गणित
लेकिन अब स्थिति बदल रही है। यह मॉडल मानता है कि महंगाई डिमांड-ड्रिवन है, जिसे ब्याज दरों से कंट्रोल किया जा सकता है। भारत में समस्या अब सप्लाई-साइड से आ रही है। सरकार का Ethanol Blending Mandate एक बड़ा फैक्टर है, जहां मक्का और गन्ने जैसी फसलों का बड़ा हिस्सा ईंधन बनाने में इस्तेमाल हो रहा है।
इसका सीधा असर खाने-पीने की चीजों के दाम पर पड़ा है। चूंकि Consumer Price Index (CPI) में फूड बास्केट का वेटेज बहुत ज्यादा है, इसलिए यह सीधे तौर पर हेडलाइन इंफ्लेशन को बढ़ा रहा है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
MPC के सामने अब एक बड़ा धर्मसंकट है। अगर RBI महंगाई घटाने के लिए रेट बढ़ाती है, तो ग्रोथ पर असर पड़ेगा। अगर रेट स्थिर रखती है, तो खाने-पीने की बढ़ती महंगाई आम आदमी की जेब खाली कर देगी। निवेशकों को अब इस पर नजर रखनी चाहिए कि सरकार कैसे फूड सिक्योरिटी और एनर्जी सिक्योरिटी के बीच बैलेंस बनाती है, क्योंकि यही भविष्य में ब्याज दरों का रास्ता तय करेगा।
