16वें वित्त आयोग (FC-16) ने 2026-31 की अवधि के लिए अपनी रिपोर्ट में बड़े वित्तीय बदलावों की सिफारिश की है। इसमें रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट्स को खत्म करने और टैक्स शेयरिंग को GDP योगदान से जोड़ने जैसे अहम सुझाव शामिल हैं। ये बदलाव राज्यों के लिए वित्तीय अनुशासन को बढ़ाएंगे और फंड आवंटन को प्रदर्शन-आधारित बनाएंगे। निवेशकों के लिए, यह अगले पांच सालों में राज्यों में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की फंडिंग और प्रबंधन को प्रभावित कर सकता है।
16वें वित्त आयोग (FC-16) ने 2026-31 की अवधि के लिए भारत की टैक्स रेवेन्यू को केंद्र और राज्यों के बीच बांटने के तरीके को लेकर अपनी सिफारिशें जारी कर दी हैं। इन सिफारिशों से देश के वित्तीय परिदृश्य में बड़े बदलाव आने की उम्मीद है। आयोग ने जहां राज्यों को केंद्रीय करों का कुल हिस्सा 41% पर बरकरार रखा है, वहीं फंड वितरण के तरीकों और उनसे जुड़ी शर्तों में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं।
ग्रांट्स और टैक्स शेयरिंग में बड़े बदलाव
रिपोर्ट का एक अहम बदलाव यह है कि 'पोस्ट-डेवोल्यूशन रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट्स' को बंद कर दिया गया है। ये ग्रांट्स पहले घाटे में चल रहे राज्यों के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करती थीं। इसके अलावा, आयोग ने सेक्टर-स्पेशफिक और स्टेट-स्पेशफिक ग्रांट्स को भी खत्म कर दिया है। इनकी जगह, नए ढांचे में दक्षता और उत्पादकता को प्राथमिकता दी गई है। एक खास बदलाव 'कंट्रीब्यूशन टू जीडीपी' (GDP में योगदान) को नए हॉरिजॉन्टल डेवोल्यूशन मानदंड के रूप में शामिल करना है, जिसे 10% वेटेज दिया गया है। इसने पुराने 'टैक्स एंड फिस्कल एफर्ट' मानदंड की जगह ली है, जिससे उन राज्यों को फायदा होगा जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में ज्यादा योगदान करते हैं।
निवेशकों के लिए, ये बदलाव वित्तीय प्राथमिकताओं पर अधिक केंद्रीकृत नियंत्रण का संकेत देते हैं। हालांकि केंद्र का लक्ष्य आर्थिक दक्षता बढ़ाना है, लेकिन बिना शर्त ग्रांट्स के खत्म होने से राज्यों के खर्च करने की क्षमता सीमित हो जाएगी। इससे क्षेत्रीय असमानताएं बढ़ सकती हैं, क्योंकि औद्योगिकरण में पिछड़े राज्यों को फंड जुटाने में ज्यादा मुश्किल हो सकती है, वहीं ज्यादा विकसित और उच्च-GDP वाले राज्य बेहतर स्थिति में होंगे।
राज्य-स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर पर असर
राज्यों की वित्तीय स्थिति इंफ्रास्ट्रक्चर, कंस्ट्रक्शन और ईपीसी (इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन) सेक्टर की कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक है। इनमें से कई कंपनियां राज्य-प्रायोजित आर्डर और सरकारी खर्च पर अपनी राजस्व वृद्धि के लिए निर्भर करती हैं। नई सिफारिशों के तहत, राज्यों को अब सख्त वित्तीय अनुशासन का पालन करना होगा, जिसमें GSDP (ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट) का 3% डेफिसिट कैप और ऑफ-बजट उधारी पर पूर्ण प्रतिबंध शामिल है।
जहां ये नियम कर्ज के संकट को रोकने और राष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए बनाए गए हैं, वहीं ये नकदी की तंगी वाले राज्यों की नई बड़ी पूंजी परियोजनाओं को शुरू करने की क्षमता को भी सीमित कर सकते हैं। राज्य सरकार के अनुबंधों में अधिक जोखिम वाली कंपनियों को ट्रैक करने वाले निवेशकों को भुगतान चक्र और परियोजना अनुमोदन समय-सीमा की निगरानी करनी चाहिए। यदि इन नए वित्तीय कैप के कारण राज्यों को नकदी की समस्या का सामना करना पड़ता है, तो परियोजना निष्पादन की गति और नए आर्डरों का प्रवाह अधिक चयनात्मक हो सकता है।
राजकोषीय अनुशासन और भविष्य का दृष्टिकोण
आयोग ने 2026-31 चक्र के लिए लगभग ₹9.47 लाख करोड़ की कुल ग्रांट-इन-एड की सिफारिश की है, जो पिछले अवधियों की तुलना में एक कम आंकड़ा है। दक्षता पर आयोग का जोर बताता है कि भविष्य में फंडिंग अधिक सशर्त होगी, जिसके लिए राज्यों को विशिष्ट अनुपालन मेट्रिक्स को पूरा करना होगा। जैसे-जैसे सरकार इस नए ढांचे में बदलाव करेगी, बाजार सहभागियों के लिए मुख्य बात यह होगी कि विभिन्न राज्य अपने बजट को कैसे अनुकूलित करते हैं। यह बदलाव विकास के प्रदर्शन में अंतर पैदा कर सकता है, जहां सख्त वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम राज्य लाभान्वित होंगे, जबकि ऐसा करने में असमर्थ राज्यों को धीमी विकास गति का अनुभव हो सकता है।
