16th Finance Commission ने 2026-31 के लिए डिजास्टर मैनेजमेंट हेतु **₹2.84 लाख करोड़** आवंटित किए हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि स्ट्रक्चरल सुधारों की तुलना में राहत कार्यों पर अधिक खर्च से भविष्य में इकोनॉमिक स्थिरता पर असर पड़ सकता है।
16th Finance Commission ने 2026-31 की अवधि के लिए डिजास्टर मैनेजमेंट का फाइनेंशियल रोडमैप तैयार कर लिया है, जिसके तहत कुल ₹2.84 लाख करोड़ की राशि तय की गई है। इस फंड के वितरण पर अब बहस शुरू हो गई है कि क्या यह सरकारी खर्च की एफिशिएंसी के लिहाज से सही है। मौजूदा फ्रेमवर्क में ₹1.64 लाख करोड़ तत्काल राहत कार्यों के लिए रखे गए हैं, जबकि लॉन्ग-टर्म मिटिगेशन (Mitigation) यानी बचाव कार्यों के लिए सिर्फ ₹40,880 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
राहत बनाम बचाव: आर्थिक गणित
मौजूदा स्थिति यह है कि सरकार बचाव के लिए ₹1 खर्च कर रही है, जबकि आपदा के बाद राहत पर ₹4 खर्च किए जा रहे हैं। मैक्रो-इकोनॉमिक नजरिए से यह चिंताजनक है क्योंकि भारत का सालाना 0.4% GDP आपदाओं के कारण होने वाले नुकसान की भेंट चढ़ जाता है। एक्सपर्ट्स का तर्क है कि बार-बार होने वाले क्लाइमेट-रिलेटेड नुकसान को देखते हुए केवल 'रिएक्टिव' (Reactive) खर्च टिकाऊ नहीं है, क्योंकि यह सरकारी संपत्तियों की प्रोडक्टिविटी को कम कर रहा है।
इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए क्या हैं संकेत?
देश का मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर—जैसे सड़कें, पावर ग्रिड और वॉटर नेटवर्क—पुराने वेदर पैटर्न के हिसाब से बने हैं, जो अब क्लाइमेट चेंज के दौर में कमजोर साबित हो रहे हैं। इस बदलाव का असर उन कंपनियों पर पड़ सकता है जो पावर, लॉजिस्टिक्स और हेवी कंस्ट्रक्शन सेक्टर में काम कर रही हैं। भविष्य के टेंडर्स और कॉन्ट्रैक्ट्स में अब 'क्लाइमेट रिस्क असेसमेंट' एक स्टैंडर्ड फीचर बन सकता है।
क्या है लोकल स्ट्रैटेजी का फायदा?
एक्सपर्ट्स अब 'वन-साइज-फिट्स-ऑल' (One-size-fits-all) मॉडल से आगे निकलने की सलाह दे रहे हैं। मैंग्रोव बहाली, वेटलैंड मैनेजमेंट और हिल-स्लोप स्टेबिलाइजेशन जैसे क्षेत्रीय समाधान न केवल बेहतर हैं, बल्कि आपदा से निपटने के सरकारी खर्च को कम करने में भी कारगर हो सकते हैं। निवेशकों के लिए अब यह देखना अहम होगा कि आने वाली इंफ्रास्ट्रक्चर पॉलिसीज क्लाइमेट-रेजिस्टेंट डिजाइन (Climate-resilient design) को कितना प्राथमिकता देती हैं।
