सरकार के लॉन्ग-टर्म बॉन्ड की यील्ड (Yield) गिरकर **6.94%** पर आ गई है। इसकी मुख्य वजह नई बॉन्ड सप्लाई की कमी और संस्थागत निवेशकों की जोरदार मांग है। इंश्योरेंस कंपनियां और EPFO लॉन्ग-टर्म एसेट्स को लॉक कर रहे हैं, जिससे यह ट्रेंड देखने को मिल रहा है। हालांकि, जारी करने वालों के लिए यह अच्छा माहौल है, लेकिन निवेशकों को ग्लोबल तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और लगातार बनी रहने वाली महंगाई जैसे जोखिमों पर नजर रखनी चाहिए।
बॉन्ड मार्केट में आई तेजी की खास वजह?
भारतीय सरकारी बॉन्ड मार्केट में इन दिनों एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। लॉन्ग-टर्म सिक्योरिटीज की यील्ड (Yield) इस फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत के मुकाबले कम हो गई है। अगस्त 2026 के मध्य तक, 15-साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 6.94% तक गिर गई है, जो 31 मार्च को 7.45% थी। यह कमी 30-साल, 40-साल और 50-साल जैसे लॉन्ग-टर्म मैच्योरिटी वाले बॉन्ड्स की यील्ड में भी देखी जा रही है।
सप्लाई-डिमांड का गणित
इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह है सप्लाई और डिमांड का असंतुलन। एक तरफ, इंश्योरेंस कंपनियों और एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन (EPFO) जैसे बड़े संस्थागत निवेशकों (Institutional Investors) की तरफ से जबरदस्त मांग (Demand) है। ये संस्थाएं अपनी लॉन्ग-टर्म देनदारियों को पूरा करने के लिए लॉन्ग-ड्यूरेशन, हाई-क्वालिटी वाले डेट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करना चाहती हैं।
वहीं दूसरी तरफ, इस फाइनेंशियल ईयर में लॉन्ग-ड्यूरेशन बॉन्ड्स की सप्लाई (Supply) सीमित रही है। सरकार ने अपने इश्यूएंस कैलेंडर (Issuance Calendar) में बदलाव किया है, जिसके कारण पिछले साल के मुकाबले मार्केट में 30-साल, 40-साल और 50-साल के बॉन्ड्स का अनुपात कम रहा है।
NaBFID का उदाहरण
हाल ही में नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट (NaBFID) के बॉन्ड इश्यूएंस में यह ट्रेंड साफ दिखा। संस्था ने ₹3,000 करोड़ के 15-साल के बॉन्ड्स पेश किए थे, लेकिन मार्केट से ₹8,291.49 करोड़ की बोलियां आईं। यह ऑफर साइज का लगभग 2.8 गुना था, जो सीमित सप्लाई के बावजूद हाई-क्वालिटी पेपर्स की मजबूत मांग को दर्शाता है।
आगे के जोखिम
फिलहाल यील्ड में गिरावट का माहौल बना हुआ है, लेकिन मार्केट का आउटलुक पूरी तरह से जोखिम-मुक्त नहीं है। हालांकि कुछ कैपिटल इक्विटी से निकलकर सरकारी बॉन्ड्स में वापस आया है, लेकिन निवेशक अभी भी स्ट्रक्चरल जोखिमों (Structural Risks) के प्रति सतर्क हैं। एनालिस्ट्स का मानना है कि लगातार बनी रहने वाली महंगाई (Inflationary Pressures) और ग्लोबल ऑयल प्राइस की अस्थिरता (Volatility) भविष्य की मॉनेटरी पॉलिसी को प्रभावित कर सकती है। अगर महंगाई इसी तरह बनी रहती है, या ग्लोबल जियोपॉलिटिकल टेंशन ऊर्जा की लागत को बढ़ाती है, तो सेंट्रल बैंक की पॉलिसी या निवेशक के सेंटीमेंट में बदलाव आ सकता है।
इसके अलावा, सरकार की फाइनेंसिंग की जरूरतें जारी रहेंगी, इसलिए डेट की सप्लाई पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। भले ही वर्तमान कैलेंडर में लॉन्ग-टेनोर इश्यूएंस कम रहे हों, लेकिन बॉरोइंग की जरूरतों में कोई भी बड़ा बदलाव या इंटरेस्ट रेट में अचानक बड़ा उतार-चढ़ाव मौजूदा डिमांड-सप्लाई बैलेंस को बदल सकता है। अभी के लिए, निवेशक आने वाले ऑक्शन कैलेंडर और महंगाई के आंकड़ों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं, जो यह तय करेंगे कि लॉन्ग-टर्म यील्ड में यह कमी जारी रहेगी या इसमें बढ़ोतरी का दबाव बनेगा।
