विदेशी संपत्तियों को छिपाने वाले **1,100** से ज्यादा करदाताओं ने 'FAST-DS' स्कीम के तहत स्वेच्छा से अपना खुलासा किया है। यह योजना दिसंबर **2026** तक करदाताओं को भारी जुर्माने से बचाकर अपनी संपत्ति को वैध बनाने का मौका दे रही है।
ग्लोबल डेटा और टैक्स विभाग की सख्ती
इस खुलासे के पीछे सबसे बड़ी वजह भारतीय टैक्स अथॉरिटीज की विदेशी संपत्तियों पर बढ़ती निगरानी है। AEOI (Automatic Exchange of Information) फ्रेमवर्क के जरिए, भारत को CRS (Common Reporting Standard) और FATCA जैसे समझौतों से दुनिया भर के देशों से डेटा मिल रहा है। इसकी मदद से विभाग ने UAE जैसी जगहों पर छिपी हुई रेजिडेंशियल और कमर्शियल प्रॉपर्टीज को ट्रैक किया है। टैक्स विभाग अब ई-फाइलिंग पोर्टल पर ही करदाताओं को डेटा के जरिए 'नज' (Nudge) कर रहा है, जिससे साफ है कि विदेशी संपत्ति अब टैक्स सिस्टम से छिपी नहीं है।
क्या है स्कीम का गणित और कानूनी सुरक्षा?
जो लोग FAST-DS का विकल्प चुन रहे हैं, उन्हें संपत्ति की फेयर मार्केट वैल्यू पर 30% टैक्स और इतना ही यानी 30% जुर्माना देना होगा। यह रकम बड़ी लग सकती है, लेकिन यह 'ब्लैक मनी एक्ट' के तहत लगने वाले कठोर जुर्माने और कानूनी कार्रवाई से बचने का सबसे सुरक्षित रास्ता है।
इसके अलावा, अगर किसी ने संपत्ति का हिसाब तो रखा था लेकिन एनुअल फाइलिंग में नहीं दिखाया था, तो उनके लिए ₹1 लाख की रेगुलराइजिंग फीस का प्रावधान है। यह उस ₹10 लाख के सालाना जुर्माने से कहीं बेहतर विकल्प है, जो हर बार बिना खुलासा किए जाने पर लगाया जा सकता है।
ध्यान रखें ये जरूरी बातें
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण डेडलाइन दिसंबर 2026 की है। जैसे-जैसे यह तारीख नजदीक आ रही है, विशेषज्ञों की सलाह है कि विदेशी होल्डिंग्स रखने वाले लोग तुरंत अपनी फाइलिंग की समीक्षा करें। चूंकि AEOI नेटवर्क का दायरा लगातार बढ़ रहा है, ऐसे में छिपी हुई संपत्तियों को पकड़े जाने का रिस्क लगातार बढ़ रहा है। अपनी कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समय रहते फाइलिंग पूरा करना ही समझदारी है।
